प्रो. दयानंद तिवारी
महानगरीय पश्चिमी भारत-विशेषकर मुंबई, पुणे और ठाणे ने ऐसी सहजीव सांस्कृतिक भूमि गढ़ी है, जहां हिंदी और मराठी साहित्य बराबरी से सांस लेते हैं। यह सेतु केवल भाषिक नहीं, वैचारिक और सौंदर्य-बोध के स्तर पर भी सुदृढ़ है, भक्ति से आधुनिकता, प्रगतिशीलता से उत्तर-आधुनिकता और मुद्रित पुस्तक से डिजिटल स्क्रीन तक। साहित्य शलाका की इस कड़ी में हम इसी बहुपरत सेतु को आधुनिक साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में समझते हैं।
१) स्रोत-परंपरा: संत साहित्य की साझी जमीन
हिंदी-मराठी साहित्य-संवाद की जड़ें संत परंपरा में गहरी हैं। हिंदी में कबीर, तुलसी, सूर; मराठी में ज्ञानेश्वर, नामदेव, तुकाराम-इन सबने भाषा को लोक की आवाज बनाया, विचार को चौपाल पर उतारा। निर्गुण–सगुण विमर्श, कर्म–भक्ति का संतुलन, आचरण की नैतिकता, ये साझा मूल्य आगे चलकर आधुनिकता की संवेदना-धुरी बने। मनुष्य-केंद्रित दृष्टि, सामाजिक न्याय का आग्रह और लोकोन्मुख भाषा। यही कारण है कि दोनों परंपराएं श्रद्धा और तर्क, दोनों का संतुलन साधते हुए समाज की नब्ज पर हाथ रखती हैं।
२) आधुनिकता के प्रश्न: व्यक्ति, समाज और यथार्थ
औपनिवेशिक-उत्तर औपनिवेशिक संक्रमण ने दोनों साहित्य-धाराओं को नए सवालों से रूबरू कराया। व्यक्ति की स्वतंत्रता, स्त्री-पुरुष संबंध, नगर–ग्राम विषमता, श्रम-पूंजी का तनाव, जाति–सत्ता की असमानताएं। हिंदी कहानी में यथार्थवाद और सामाजिक सरोकार गहरे हुए तो मराठी में ‘लिटिलमैगजीन’ आंदोलन, नाटक और कविता में प्रयोगशीलता की तेज रेखा उभरी। यह प्रभाव-प्रतिक्रिया का सरल समीकरण नहीं, बल्कि ‘संगति–विसंगति’ का रचनात्मक खेल है, जहां समानताओं के बीच भिन्नता सर्जना को निरंतर उकसाती रहती है। हिंदी रंगकर्म का दस्तावेजी यथार्थ मराठी रंगपरंपरा की पैनी आलोचना से धार पाता है और मराठी कविता की सघनता हिंदी गद्य की बहुरसता से संवाद करती है।
३) समाज-न्याय के स्वर: दलित, स्त्री और श्रम
आधुनिक संवेदना का सबसे तीखा स्वर समाज-न्याय है। मराठी दलित साहित्य ने आत्मकथा, कविता और कहानी में जो सैद्धांतिक साहस दिखाया, उसने हिंदी जगत के दलित-बहुजन लेखन को नया आत्मविश्वास दिया। श्रम, गरिमा और अधिकार के प्रश्न दोनों भाषाओं में समान रूप से उभरते हैं। स्त्री-विमर्श भी घरेलू परतों से लेकर देह-मन की मुक्ति, कामकाजी दुनिया की चुनौतियों और आत्मानुभूति की भाषा तक विस्तृत हुआ। इस पारस्परिकता ने साहित्य को ‘प्रतिनिधि’ भर नहीं रहने दिया, बल्कि ‘प्रतिवादी’ बनाया। यथास्थिति पर सवाल उठाने वाला, सत्ता-संरचनाओं के समक्ष पाठक को सचेत करने वाला।
४) अनुवाद: संगति की सड़कें, परिप्रेक्ष्य का यातायात
भाषाओं के बीच सबसे पुख्ता पुल अनुवाद है। यह केवल पाठांतरण नहीं, परिप्रेक्ष्यांतरण भी है। स्थानीय शब्द-संस्कृति, लहजा, छंद और काव्य-लय का। अनुवाद ने (१) भाषा-सीमाओं के पार नया पाठवâ-समुदाय रचा और (२) लेखकों को ‘स्थानीय’ चिंता को ‘सार्वभौमिक’ परिप्रेक्ष्य में देखने की दृष्टि दी। आज पत्रिकाएं, विश्वविद्यालय, साहित्यिक पोर्टल, कार्यशालाएं और संयुक्त संकलन, सब मिलकर अनुवाद को सक्रिय सेतु बनाते हैं। यह रेलिंग की तरह है, सेतु को सुरक्षा भी देता है और विस्तार भी।
५) रंगमंच, सिनेमा और गीत: लोकप्रियता का साझा मंच
मुंबई-पुणे का रंगमंच और सिनेमा हिंदी-मराठी साहित्यिक भावभूमियों को लोकप्रिय माध्यमों में रूपांतरित करते हैं। नाटकों के पुनर्लेख, पटकथाओं के कथा-संकेत, गीत-लेखन की बोलचाल-यहां भाषाएं प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक बनती हैं। मराठी रंग-परंपरा की सामाजिक आलोचना हिंदी रंगकर्म में घुलकर नाटकीय ताप बढ़ाती है; हिंदी की व्यापक संप्रेषण-क्षमता मराठी विषयवस्तु के प्रसार की परिधि बढ़ाती है। लोकप्रियता का जोखिम ‘सरलीकरण’ है, मगर उसका लोकतांत्रिक लाभ ‘पहुंच है और साहित्य के जनतंत्र में पहुंच अपने आप में नैतिक मूल्य है।
६) शैली, लहजा और भाषा-राजनीति: भिन्नता की भव्यता
हिंदी-मराठी शैलीगत भिन्नताएं सेतु को कमजोर नहीं, प्रबल बनाती हैं। हिंदी गद्य-कविता का मुहावरेदार बहुरस, दीर्घ वाक्यों का लोच और कथन की संगति-मराठी काव्य की सघनता, सांद्रता और तीक्ष्णता से संवाद करती है। शिक्षा-प्रशासन-बाजार की भाषा-राजनीति तनातनी पैदा करती है, पर साहित्य पहचान को संकुचित होने से बचाकर साझा स्मृतियों का विस्तार करता है। आधुनिक लेखक समझता है कि ‘लोकल’ और ‘ग्लोबल’ के बीच टिकाऊ पुल ‘इंटर-लोकल’ नेटवर्क से बनते हैं—हिंदी–मराठी सेतु उसी इंटर-लोकलता का जीवित नमूना है।
७) महानगरीय पाठ्यभूमि: मुंबई–पुणे–ठाणे का ‘जीवित पाठ’
महानगर स्वयं ‘जीवित पाठ’ है—लोकल ट्रेनें, चॉल/हाउसिंग सोसायटी, दफ्तर–कारखाने, फुटपाथ-वैंâटीन, त्योहार–जुलूस। यहां लिखी हिंदी-मराठी रचनाएं एक-दूसरे की साक्षी हैं। बहुभाषी संवाद, स्लैंग, कोड-स्विचिंग, शहर की गति, ये सब कथाओं-कविताओं का ‘जीवन-संगीत’ रचते हैं। वर्ग, जाति, लिंग, प्रवास और श्रम-सभी प्रश्न एक प्रâेम में उभरते हैं; सेतु यही है कि दोनों भाषाएं मिलकर उस प्रâेम को लोकतांत्रिक बनाती हैं। केंद्रीय ‘एक स्वर’ के बजाय बहुध्वनि संसार के पक्ष में खड़ी होती हैं।
८) शिक्षा, संस्थाएं और साहित्यिक जनतंत्र
विश्वविद्यालय, साहित्य परिषदें, पुस्तकालय, महोत्सव और अब डिजिटल मंच, ये सब स्तंभ हैं, जिन पर यह सेतु टिकता है। द्विभाषिक सेमिनार, संयुक्त संकलन, अनुवाद पुरस्कार, छात्र-विनिमय-लेखक और पाठक दोनों का क्षितिज चौड़ा करते हैं। पाठ्यक्रमों में तुलनात्मक, पारभाषिक अध्ययन की बढ़ती उपस्थिति ने युवा शोध को ‘एक भाषा-एक साहित्य’ की दीवार से बाहर निकाला है। साहित्य का जनतंत्र तभी पुख्ता होता है जब लेखक-पाठक-आलोचक–अनुवादक-चारों ‘सह-लेखन’ जैसी साझेदारी में आएं, हिंदी-मराठी परिदृश्य में यह अब अनुभवजन्य सत्य है।
९) डिजिटल युग: स्क्रीन पर बना नया पुल
ब्लॉग,वेब-पत्रिकाएं, पॉडकास्ट,सोशल मीडिया-इन सबने सेतु को चौड़ा और तात्कालिक बनाया है। युवा लेखक दोनों भाषाओं में सूक्ष्म-लघु-हाइब्रिड फॉर्म आजमा रहे हैं। इंस्टा-कविता, बोलचाल निबंध, माइक्रो-फिक्शन, लघु-नाटक, वीडियो-एसे। पाठक अब ‘अनुवाद-प्रतीक्षा’ नहीं करते-रीड–शेयर-डायलॉग का चक्र वास्तविक समय में पूरा होता है। क्रॉस-पोस्टिंग और सह-रीडिंग ने पारभाषिक समुदायों को एक-दूसरे के ‘टाइमलाइन’ से जोड़ दिया है, जहां भाषा की सीमाएं कम, संवेदना की सेतु-रेखाएं ज्यादा दिखती हैं।
१०) सेतु का नैतिक वचन
हिंदी-मराठी साहित्य का सेतु भाषाई अदल-बदलभर नहीं, आधुनिकता का नैतिक अनुबंध है। साझी संवेदनाओं की रक्षा, भिन्नताओं का उत्सव और न्यायपूर्ण समाज की आकांक्षा। महानगर की बहुभाषी लय इस सेतु को रोज जीती है; संस्थाएं और डिजिटल मंच इसे रोज बढ़ाते हैं। साहित्य शलाका का उद्देश्य भी यही है कि हिंदी-मराठी की साझा संस्कृति का पुनर्पाठ-तथ्य, अनुभव और सौंदर्य-एक साथ, नए रूप और नए तर्क के साथ प्रस्तुत हो। इतिहास तब बनता है जब भाषाएं पुल बनाती हैं और समाज उस पुलपर निर्भय होकर चलता है। यही सेतु-यही भविष्य।
