कुछ कबीले ऐसे भी हैं
जहां बेटे के लिए नहीं
बेटी के लिए शहनाई, ढोल बजता है।
दाम बेटे का नहीं, बेटी का मां-बाप लगाते हैं।
जो खरीद सकता है अपने लिए दुल्हन,
पत्नी खरीद लेता है
अन्यथा कुआंरा ही रह जाता है।
समय पुराना था जब
दिव्यांग बेटी का उपहारों के साथ
पिता कन्यादान करता था।
आज पुत्र का पिता इसे हक मान बैठा है
उसके सम्मान का पैमाना बन गया है।
सामान मांग से कम है, आशा से कम है
लताड़, अपमान बेटी सहती है।
मार दी जाती है या वह अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेती है।
आंखों के नहीं, अब विचारों के चश्मे बदलने होंगे।
बेटियों को भी गुणों को अधिक महत्व देना होगा,
समानता के अधिकार ने कुछ भरमाया भी है।
सहनशीलता समाप्त हो गई है
क्योंकि बेटी भी तो अपने पैरों पर खड़ी है।
आज दहेज दानव को मारना होगा
अपने परिवारों से इसे प्रारम्भ करना होगा।
बेटे-बेटी को बराबर समझना होगा।
बेला विरदी
