के. पी. मलिक
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता (ट्रेड डील) अंतिम चरण में बताया जा रहा है। सरकार इसे वैश्विक व्यापार, निवेश और आर्थिक विकास के अवसर के रूप में प्रस्तुत कर सकती है, लेकिन किसान संगठनों द्वारा उठाई जा रही आशंकाएँ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने जिस प्रकार इस समझौते को देश की कृषि, डेयरी, पोल्ट्री और खाद्य संप्रभुता के लिए खतरा बताया है, उसने एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया है।
भारत की कृषि केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है; यह करोड़ों परिवारों की आजीविका, ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ और देश की खाद्य सुरक्षा का आधार है। अमेरिका जैसे विकसित देशों में कृषि क्षेत्र को भारी सरकारी सहायता, सब्सिडी और तकनीकी समर्थन प्राप्त होता है। यदि भारतीय बाजार बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए खोल दिए जाते हैं, तो छोटे और मध्यम भारतीय किसानों के लिए प्रतिस्पर्धा करना बेहद कठिन हो सकता है। कपास, सोयाबीन तेल, ज्वार, डेयरी और पोल्ट्री जैसे क्षेत्रों पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
हरियाणा से आई किसान नेत्री सुमन हुड्डा ने कहा कि किसान संगठनों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि व्यापार समझौतों के माध्यम से धीरे-धीरे कृषि क्षेत्र में बहुराष्ट्रीय कंपनियों का प्रभाव बढ़ सकता है। उनका तर्क है कि यदि कृषि उत्पादन और खाद्य आपूर्ति का नियंत्रण बड़ी कंपनियों के हाथों में चला गया, तो भविष्य में किसानों की स्वतंत्रता और उपभोक्ताओं की खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित हो सकती हैं। यद्यपि यह आशंका अभी संभावनाओं के स्तर पर है, लेकिन दुनिया के कई देशों में कृषि क्षेत्र के कॉरपोरेट केंद्रीकरण के उदाहरण किसानों की चिंताओं को पूरी तरह निराधार भी नहीं बनने देते।
एक और महत्वपूर्ण मुद्दा न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सार्वजनिक खरीद प्रणाली का है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत की खाद्य सब्सिडी और एमएसपी व्यवस्था को लेकर पहले भी प्रश्न उठते रहे हैं। यदि किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण एमएसपी या सरकारी खरीद प्रणाली कमजोर होती है, तो इसका सबसे अधिक प्रभाव पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश के उन क्षेत्रों पर पड़ेगा, जहाँ लाखों किसान अपनी फसलों के लिए सरकारी खरीद पर निर्भर हैं। हालांकि, अभी तक सरकार ने एमएसपी समाप्त करने जैसी किसी नीति की घोषणा नहीं की है, लेकिन किसानों की आशंकाओं को दूर करने के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक आश्वासन आवश्यक है।
डेयरी और पोल्ट्री क्षेत्र भी इस बहस का केंद्र हैं। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक देश है, जहाँ करोड़ों छोटे पशुपालक दो या तीन पशुओं के सहारे अपना जीवनयापन करते हैं। यदि अमेरिकी डेयरी उत्पादों के लिए बाजार खोलने का दबाव बढ़ता है, तो इसका प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण परिवारों की आय पर भी पड़ेगा। इसी प्रकार, जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीएम) उत्पादों के संभावित प्रवेश को लेकर भी व्यापक सामाजिक और वैज्ञानिक बहस की आवश्यकता है।
हालाँकि, इस पूरे मुद्दे का दूसरा पक्ष भी है। किसी भी व्यापार समझौते का उद्देश्य केवल आयात बढ़ाना नहीं होता, बल्कि निर्यात, निवेश, तकनीक और बाजार तक पहुँच को भी बढ़ाना होता है। यदि भारत अपने किसानों और कृषि क्षेत्र के हितों की रक्षा करते हुए संतुलित शर्तों पर समझौता करता है, तो कुछ क्षेत्रों को लाभ भी मिल सकता है। इसलिए सवाल केवल ट्रेड डील का नहीं, बल्कि उसकी शर्तों का है।
सबसे बड़ी आवश्यकता पारदर्शिता की है। यदि यह समझौता वास्तव में देश के किसानों, पशुपालकों और उपभोक्ताओं के हितों को प्रभावित करने वाला है, तो इसके प्रस्तावों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। किसान संगठनों, कृषि वैज्ञानिकों, डेयरी विशेषज्ञों, राज्यों की सरकारों और संसद की संबंधित समितियों से व्यापक परामर्श के बाद ही कोई अंतिम निर्णय लिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में इतनी बड़ी आर्थिक और सामाजिक नीति बंद कमरों में नहीं तय होनी चाहिए।
भारत की आर्थिक प्रगति महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि विकास की कीमत देश का किसान न चुकाए। सरकार के सामने चुनौती यही है कि वह वैश्विक व्यापार के अवसरों और राष्ट्रीय कृषि हितों के बीच ऐसा संतुलन स्थापित करे, जिससे न तो भारत दुनिया से कटे और न ही उसके अन्नदाता स्वयं को असुरक्षित महसूस करें। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति केवल उसके व्यापारिक समझौतों में नहीं, बल्कि उसके किसानों की समृद्धि और उसकी खाद्य आत्मनिर्भरता में निहित होती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)
