– हृदयनारायण दीक्षित
स्वभाव में स्वाभाविक ऊर्जा है, लेकिन हम स्वभाव से दूर हो रहे हैं। यह चिंताजनक स्थिति है। हमारे स्वभाव का पोषण अपनी जन्मभूमि, परंपरा और राष्ट्र में हुआ। अंग्रेजी सत्ता ने यहां अपनी भाषा अंग्रेजी चलाई। अंग्रेजी सत्ता की भाषा थी। हमारे स्वभाव की भाषा नहीं है अंग्रेजी। लेकिन हम अंग्रेजी को सर्वांगपूर्ण सुंदरी मानने लगे। भूल गए कि प्रत्येक भाषा के अपने संस्कार होते हैं। यहां के प्रभु वर्ग ने अंग्रेजी के संस्कार अपनाए। अंग्रेजी उनके स्वभाव में थी। हमारे स्वभाव का बीज भारतीय भाषाओं में वृ़क्ष हो सकता है।
सभी देशों का सामाजिक और सांस्कृतिक विकास एक जैसा नहीं है इसलिए प्रत्येक देश की अपनी इतिहास दृष्टि भी है। मध्यकाल में इंग्लैंड और इसके आसपास क्रूर राजशाही थी। यूरोपीय विद्वानों ने भारत में भी उसी समय क्रूर राजशाही कल्पित की। यूरोप में सामंतवाद था। उन्होंने मान लिया कि ठीक इसी कालखंड में भारत में भी सामंतशाही होनी चाहिए। भारत के प्रभु वर्ग ने उनकी काल्पनिक बातें भी स्वीकार कर लीं। यूरोपीय इतिहास संकलन की दृष्टि भिन्न है। उन्होंने राजाओं और राजव्यवस्था का तिथिक्रम विवरण बनाया। भारत प्राचीन राष्ट्र है। यहां सभी राजाओं के विवरण जुटाने की जरूरत नहीं स्वीकार की गई। सभ्यता, आर्थिक प्रणाली, उत्पादन तंत्र का इतिहास वार्षिक विवरणी में नहीं आ सकता। यहां एक जैसी सभ्यता और संस्कृति के लिए युगबोध की परंपरा है।
प्रत्येक युग विशेष प्रकार की उत्पादन प्रणाली, सभ्यता और संस्कृति का परिचायक है।
यूरोप के कवियों, साहित्यकारों ने भी अनुभूतिपरक सृजन किया, पर प्राचीन भारत के काव्य सृजन को यहां साहित्य के साथ ही धार्मिक आदर भी मिला। वाल्मीकि रामायण उत्कृष्ट काव्य है, इतिहास है और आस्था भी है। गीता यहां दर्शन ग्रंथ है, मनोरम काव्य है और जन-जन की श्रद्धा भी है। ऋग्वेद यहां वैदिक समाज की सभ्यता, संस्कृति और दर्शन का ज्ञानकोष है, लेकिन राष्ट्रजीवन की श्रद्धा भी है। हमारी भू सांस्कृतिक प्रीति का विकास इसी साहित्य और देशना में हुआ है। यूरोप की इतिहास दृष्टि, यूरोप के लिए ही उपयोगी है। यही दृष्टि भारत पर लागू नहीं हो सकती। भारत में क्रूर-राजशाही कभी नहीं थी और न ही इंग्लैंड जैसी सामंतशाही ही।
निस्संदेह भारत में भी पहले राजतंत्र था, लेकिन राजा स्वतंत्र सत्ता नहीं थे। ऋग्वैदिक काल में भी सभा समितियां थीं। राजा विचार-विमर्श में आबद्ध थे। सामाजिक विकास क्रम के प्रारंभ में राजा नहीं था। महाभारतकार के अनुसार बिना राजा ही आमजन अपना कर्त्तव्यपालन करते थे। अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में प्राचीन भारतीय समाज की झांकी है ‘तमाम भाषाओं वाले, अनेक रीति-रिवाजों को मानने वाले लोगों को यह पृथ्वी सहस्रधार दूध देनेवाली गाय की तरह पोषण देती है। अथर्ववेद के अनुसार पहले विकास हुआ परिवार का। फिर विवाह संस्था मजबूत हुई। परिवार के बाद आवहनीय संस्था का विकास हुआ – सा आवहनीये न्याक्रामत्। विकास क्रम जारी रहा। सभा नाम की संस्था बनी। सभा के सदस्य को सभ्य कहा गया – अस्य सभ्यो भवित। सभा से समिति का विकास हुआ। इसी से मंत्रिसमूह का विकास हुआ। सदस्य आमंत्रणीय कहे गए।
भारत में सामाजिक विकास के प्रत्येक चरण में लोकतंत्रीय संस्थाएं हैं। राजा या सामंत ऐसी संस्थाओं के गठन में भागीदार नहीं हैं। मूलभूत प्रश्न है कि यह कार्य किन सचेत लोगों ने किया? अथर्ववेद में इसका सीधा उत्तर है ‘भद्रम इच्छन्त ऋषय-लोक कल्याण के इच्छुक ऋषियों ने तप दीक्षा के माध्यम से यह सब कार्य संपन्न किया। यह भारतीय इतिहासबोध है, लेकिन यूरोप या अमेरिका का विकास क्रम भिन्न है। भारतीय समाज का विकासक्रम बिल्कुल अलग है। यूरोप में संसद या पार्लियामेंट का विकास ईसा के ५०० वर्ष बाद शुरू हुआ। भारत में सभा समिति का उल्लेख ऋग्वेद में है, फिर अथर्ववेद में भी है। ऋग्वेद के रचनाकाल को यूरोपीय दृष्टि से ही देखने पर यहां सभा समिति जैसी संस्थाएं कम से कम ईसा के ३,००० वर्ष पहले की हैं।
यूरोप के कुलीन लॉर्ड हैं, सामंती व्यवस्था में वे लैंड लॉर्ड हैं। वैदिक काल का राजा नृपति है, भूपति कतई नहीं। सोच-विचार का यूरोपीयकरण आत्मघाती है। उनका पुर्जागरण ११वीं सदी के बाद का है। यहां ईसा के ५०० वर्ष पहले बुद्ध का दर्शन है। बुद्ध के भी पहले यहां उपनिषद् दर्शन है। उपनिषद् अंधविश्वास के विरोधी हैं। इनके भी बहुत पहले यहां ऋग्वेद है। वैज्ञानिक विवेक और तर्क-वितर्क की धारा है। वाद-विवाद का वातावरण है। यूरोप में ईसा के बाद चर्च की सत्ता का प्रभाव लगातार बढ़ा। प्रोटेस्टेंट आए। उनके इतिहास बोध में यहां भी पंथिक विद्रोह होना चाहिए। लेकिन यहां धार्मिक या पंथिक विद्रोह की जरूरत नहीं थी। चर्च जैसी आधिपत्यवादी पंथिक सत्ता यह कभी थी ही नहीं। तर्क प्रतितर्क के अवसर यहां की संस्कृति में सदा से ही थे। इसी वातावरण में हम सबका व्यक्तिगत स्वभाव बना और सामूहिकता में विशेष प्रकार का राष्ट्रभाव भी।
भारतीय इतिहासबोध को यूरोपीय चश्मे से नहीं देखा जा सकता। मध्यकाल उनका अंधकार युग है। भारत में उसी समय भक्तिदर्शन की राष्ट्रव्यापी अनुगूंज है। राष्ट्र यहां वैदिक काल में हैं। यूरोप के नेशन स्टेट की धारणा ५०० बरस से ज्यादा पुरानी नहीं। यूरोपीय दर्शन एशियायी यूनानी दर्शन की उधारी है। भारतीय दर्शन की प्राचीनता विश्वसिद्ध है। उनकी अपनी दृष्टि है। हम अपनी प्रकृति, संस्कृति और राष्ट्रभाव की दृष्टि से ही अपना मूल्यांकन करें तो उचित होगा। कोई कह सकता है कि क्या भारत अंतर्राष्ट्रीय दृष्टि से अपना अलग दृष्टिकोण अपना सकता है? इसके उत्तर में प्रश्न है कि यूरोपीय या अमेरिकी दृष्टि ही अंतर्राष्ट्रीय क्यों है? वे जो पहने, खाएं, पीएं, नाचें, बोलें, वही ग्लोबल क्यों है? और हमारी उदात्त जीवन दृष्टि, सौंदर्यबोध और विश्व को परिवार जानने की दृष्टि लोकल क्यों है?
प्रश्न बड़ा है। यूरोपीय जीवन दृष्टि ही ग्लोबल और भारतीय जीवन दृष्टि लोकल नहीं हो सकती। वसुधैव कुटुंबकम् भारत का प्राचीन विचार है। हम समूचे विश्व को एक परिवार जानते हैं। एकात्म अनुभूति की भारतीय दृष्टि अंतर्राष्ट्रीय ही है, यूरोपीय दृष्टि का आदर है, लेकिन हमें उनका चश्मा नहीं ही पहनना है। स्वभाव ही आनंद का स्रोत है। भारतीय जीवन दृष्टि में ‘स्व’ विराट की ही इकाई है। स्व-भाव इसी का विकास है। विश्व हमारे लिए यों ही परिवार नहीं है। यह हमारी स्वभावगत प्रतीति और अनुभूति है। इसलिए सभ्यता के यूरोपीय या अमेरिकीकरण उपकरण का वरण कोरी नकल ही होगा। उनके तमाम विद्वान भारतीय दर्शन और चिंतन की ओर निहार रहे हैं और हम उनके उच्छिष्ट के लिए आकुल-व्याकुल हैं। दुख है कि उनकी नकल ही प्रगतिशीलता की प्रतिभूति मानी जा रही है। भारत की ज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान संपदा पिछड़ी बताई जा रही है। ऐसे अंधानुकरण के विरुद्ध एक सार्थक हस्तक्षेप और प्रतिरोध की आवश्यकता है। हमें उधार की सभ्यता नहीं चाहिए। स्वभाव पर्याप्त है, स्वानुभूति का आनंद अपना है। स्वभाव के रस, रंग और आत्मसंस्पर्श की अनुभूति का छंद बाहर से नहीं भारत के इतिहास, भूगोल और स्वबोध में ही समाया हुआ है। यहीं हमारी जड़े हैं। अपनी जड़ों से जीवन रस लेकर ही हमें पुष्पित-पल्लवित होना चाहिए। स्वभाव के अन्तस् में आनंद का बीज है। स्वभाव ही अध्यात्म है कहा जाता है-स्वभावो अध्यात्म उच्यते।
