मुख्यपृष्ठसमाचारनिवेश गुरु : ज्ञान पंचमी विशेष ‘ज्ञान या लाभ?’

निवेश गुरु : ज्ञान पंचमी विशेष ‘ज्ञान या लाभ?’

भरतकुमार सोलंकी
मुंबई

नवरात्रि, दशहरा, दीपावली और नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं सहित कल रविवार को आनेवाली ज्ञान पंचमी, जिसे कई लोग लाभ पंचमी भी कहते हैं, हर साल एक दिलचस्प प्रश्न खड़ा करती है कि आखिर हम क्या पूजते हैं, ज्ञान या लाभ?
इस दिन कोई व्यक्ति अपनी पोथियों, किताबों और लेखनी की पूजा करता है, तो कोई अपने बहीखाते, नकद धन या नोटों पर वासक्षेप चढ़ाकर देवी-देवताओं से प्रार्थना करता है कि ‘आनेवाला वर्ष लाभ और समृद्धि से भरा रहे।’ कोई इसे ज्ञान का पर्व मानता है, तो कोई धनवृद्धि का अवसर। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि सिर्फ किताबों में छपे शब्दों की पूजा करने मात्र से ज्ञान प्राप्त हो सकता है?
किताबों को सिर झुकाने से ज्ञान नहीं आता, जब तक उन शब्दों को जीवन में उतारा न जाए। ज्ञान की पूजा का अर्थ उसे जीवन में अमल करना है, न कि केवल धूप-अगरबत्ती लगाकर किताबों को सम्मान देना। उसी तरह, कागज के नोटों पर वासक्षेप रख देने से धन के भंडार नहीं भर जाते क्योंकि लाभ प्रार्थना से नहीं, परिश्रम और प्रबंधन से आता है।
तो सवाल यह है कि क्या हम सच में ज्ञान की आराधना कर रहे हैं या लाभ के लालच की पूजा? क्या हम यह मानते हैं कि कुछ सिक्के और नोट देवी के सामने रख देने से घर में धन का सागर उमड़ पड़ेगा? या फिर हम यह समझते हैं कि असली लाभ वही है जो ज्ञान से अर्जित हो, जो सोच और कर्म के साथ जुड़ा हो।
ज्ञान पंचमी का असली अर्थ शायद यही है – धन के पीछे ज्ञान का दीप जलाना, ताकि अंधी भक्ति की जगह विवेक की रोशनी पैâले। ज्ञान ही वह निवेश है जो कभी घाटा नहीं देता। लाभ पंचमी का सच्चा रूप तब है, जब ज्ञान के बल पर किया गया निवेश जीवनभर लाभ देता है – चाहे वह व्यापार में हो, परिवार में हो या आत्मा के विकास में।
सच्चा ज्ञान वही है जो निजी अनुभव से जन्मे और जब वह पूर्ण हो जाए, वही केवल ज्ञान या सर्वज्ञता कहलाता है।
तो आइए, इस ज्ञान पंचमी पर यह प्रण लें कि हम किताबों को नहीं, उनके ज्ञान को पूजेंगे; नोटों को नहीं, उनकी समझ को साधेंगे। क्योंकि ज्ञान ही असली पूंजी है – जो हर लाभ को संभव बनाती है।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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