उम्र गुजरती जाए कुछ कर ले मना
मन चंचल भरमाए इसे कर तू मना…उम्र गुजरती जाए …
वश में नहीं जो तेरे, काहे सिर खपाए
निराधार है तेरी चिंता, तू काहे घबराए
हो के रहेगा जो भी होना, तू क्यों भय खाए
औरों के अवगुण न गिना तू कुछ अपनी सुना
मन चंचल भरमाए इसे कर तू मना… उम्र गुजरती जाए…
रिश्ते, नाते, सखी, यारी, तुझे लगे हैं प्यारी
इनके रहते शिकवे, निंदा है ये बड़ी बीमारी
धन दौलत जायदाद पर क्योंकर इतराना
बाद तेरे लुट जाना है, तेरा ‘शाही खजाना’
मन चंचल भरमाए इसे कर तू मना… उम्र गुजरती जाए…
विधाता ने ‘उपहार स्वरूप’ तुझे ‘जीवन’ है दिया
लेखा मांगेगा वो इक दिन ‘तूने कैसे हैं जिया?’
जीवन है अनमोल तेरा, इसे व्यर्थ न गवां
परोपकारी बनके तू इसका हर्ष मना
मन चंचल भरमाए इसे कर तू मना… उम्र गुजरती जाए…
इक दिन खाक हो जाना है, ये सबको पता
दौलत, शोहरत दिखावा है, नहीं अच्छा ये नशा
खुशी मिली उपहार स्वरूप कुछ बांट दे मना
इक दिन इसे भी तो हो जाना है फना
फिर करता क्यों मनमानी, और ये कूड़ जमा
उम्र गुजरती जाए कुछ कर ले मना
मन चंचल भरमाए इसे कर तू मना…उम्र गुजरती जाए …
-त्रिलोचन सिंह अरोरा
-डोंबिवली-पूर्व
