श्रीकिशोर शाही
याद है न, तीन-चार साल पहले कोविड की बीमारी ने क्या कहर बरपाया था। लाखों लोग मौत के मुंह में समा गए थे। कोविड १९ का वायरस सीने पर ऐसा अटैक करता कि व्यक्ति का सांस लेना दूभर हो जाता। फिर फेफड़ा काम करना बंद कर देता, जिससे मरीज की मौत हो जाती। मगर इंसान एक ऐसा प्राणी है, जो हर संकट से पार पा लेता है और आगे उस जैसे आनेवाले संकट का सामना करने की ताकत भी पैदा कर लेता है। वैज्ञानिक इस दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं और उन्होंने एक वैकल्पिक श्वसन प्रणाली की भी खोज कर ली है और अगर सारे प्रयोग अंत तक सफल साबित हुए तो शायद विभिन्न बीमारियों के कारण सांस न ले पानेवाले बहुत से मरीजों की जान बचाई जा सकती है। वैकल्पिक श्वसन प्रणाली, यह सुनकर ही लगता है मानों कोई खूबसूरत कल्पना लोक की सैर करवा रहा है। मगर इंसान की जिद और जुनून कुछ भी संभव कर सकता है।
वैसे वैज्ञानिकों ने जो प्रयोग किया है उसे सुनकर आपको हैरानी होगी। शायद अच्छा न भी लगे क्योंकि वैज्ञानिकों की कारगुजारी ही कुछ ऐसी है। वैज्ञानिक जो प्रयोग कर रहे हैं उसके अनुसार नाक से सांस न ले पाने की विकट परिस्थिति में मनुष्य अपने शरीर के मलद्वार के जरिए सांस ले पाएगा। इसमें एक लिक्विड को वहां अंदर डाल दिया जाता है। इस लिक्विड में काफी ऑक्सीजन मौजूद रहता है। यह ऑक्सीजन खून में पहुंचकर पूरे बॉडी में सर्वुâलेट होता है। जब सारी कोशिकाओं को ऑक्सीजन की खुराक मिल गई तो मिशन कम्प्लीट। असल में सांस की समस्या दुनियाभर में बड़ी बीमारी है। कोविड जैसी महामारी में लाखों लोगों को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ी। अगर यह तरीका काम कर गया तो यह एक बड़ी कामयाबी बनकर उभरेगी। बहरहाल, अभी यह प्रयोग शुरुआती स्टेज में है। मेडिकल जर्नल में यह रिसर्च छप चुकी है। यह प्रयोग जापान के वैज्ञानिकों ने किया है। पहला ट्रायल २७ स्वस्थ पुरुषों पर किया गया। इसके तहत ट्रायल में तरल पदार्थ ६० मिनट तक शरीर के अंग विशेष के भीतर रखा गया। इस प्रक्रिया को नाम दिया गया `एंटरल वेंटिलेशन’। तरल पदार्थ का नाम है पर्फ्लोरोकार्बन। इसी में ऑक्सीजन भरी होती है। यह ऑक्सीजन आंतों की दीवारों से गुजरकर खून में चली जाए तो फिर मरीज को नाक या मुंह से सांस लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह उन मरीजों के लिए फायदेमंद हो सकता है, जिनकी सांस की नलियां ब्लॉक हो गई हों, जैसे दम घुटने या चोट लगने पर। ओसाका यूनिवर्सिटी के बायोमेडिकल साइंटिस्ट टाकानोरी टेकेबे का कहना है कि यह पहली बार इंसानों पर डेटा आया है। इसके पहले चूहे व कुछ अन्य जीवों पर इसका प्रयोग सफल रहा है। उम्मीद है यह प्रयोग मेडिकल जगत के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
