मुख्यपृष्ठस्तंभहनीफनामा : हीरो बनने की चाहत नहीं हुई पूरी!

हनीफनामा : हीरो बनने की चाहत नहीं हुई पूरी!

हनीफ जवेरी

मात्र एक वर्ष में ही असरानी को एहसास हो गया कि फिल्मों में काम पाना इतना आसान नहीं है। इस दौरान उन्होंने पैसों के लिए कुछ फिल्मों में जूनियर आर्टिस्ट के रूप में काम किया।
अक्सर देखा गया है कि सिल्वर स्क्रीन पर जो अभिनेता हास्य भूमिका निभाकर सबको हंसाता है, उसकी अपनी जिंदगी बेहद मुश्किल दौर से गुजरी होती है और उसके पास आंसू बहाने के सिवा कुछ और नहीं होता। १ जनवरी, १९४१ को जयपुर के सिंधी परिवार में जन्मे गोवर्धन असरानी ने अपनी अंतिम सांस २० अक्टूबर, २०२५ की शाम लगभग ४ बजे आरोग्य निधि अस्पताल में ली, जहां उन्हें सांस लेने में तकलीफ के कारण चार दिन पहले भर्ती करवाया गया था।
१५ साल की उम्र में खुद को आईने में देखने के बाद असरानी को लगा कि वो हिंदी फिल्मों में हीरो बन सकते हैं। इसलिए १९५७ में पढ़ाई छोड़ हीरो बनने का सपना आंखों में संजोए असरानी मुंबई आ गए, लेकिन एक वर्ष में ही उन्हें एहसास हो गया कि फिल्मों में काम पाना इतना आसान नहीं है। इस दौरान पैसों की खातिर उन्होंने कुछ फिल्मों में बतौर जूनियर आर्टिस्ट काम किया। बतौर जूनियर आर्टिस्ट उन्होंने सबसे पहले शम्मी कपूर की फिल्म ‘उजाला’ के लिए वैâमरे का सामना किया। इसके बाद वो वापस जयपुर लौट गए और राजस्थान कॉलेज में दाखिला लेकर अपनी आगे की पढ़ाई पूरी की।
असरानी को लगा कि फिल्मों में यूं काम नहीं मिलेगा। लिहाजा, उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए १९६४ में पुणे एक्टिंग इंस्टीट्यूट की बैच में दाखिला लिया और १९६६ में अभिनय में डिप्लोमा प्राप्त किया। इसके बावजूद उन्हें फिल्मों में काम नहीं मिल रहा था। जेब खर्च के लिए उन्होंने पहले ऑल इंडिया रेडियो पर अपनी आवाज दी और फिर पुणे एक्टिंग इंस्टीट्यूट में ही शिक्षक बनकर आगे की बैच को एक्टिंग की ट्रेनिंग दी, जिनमें जया भादुड़ी, रेहाना सुल्तान, अनिल धवन जैसे छात्र शामिल थे।
इसके साथ ही उनका फिल्मों में काम पाने का संघर्ष जारी रहा। वे वीकेंड में पुणे से मुंबई आते और फिल्म प्रोड्यूसर्स एवं डायरेक्टर्स से मिलते। यह सिलसिला लगभग ५ वर्षों तक चला। अंतत: उन्हें हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘गुड्डी’ में पहला मौका मिला, जब हृषिकेश मुखर्जी ने स्वयं पुणे इंस्टीट्यूट जाकर जया भादुड़ी को फिल्म ‘गुड्डी’ के लिए साइन किया। अब इसे इत्तफाक कहें या कुछ और हीरो बनने का सपना लेकर इंडस्ट्री में कदम रखनेवाले असरानी जूनियर कलाकार बन गए।
फिल्मों में हास्य अभिनेता के रूप में असरानी सफलता प्राप्त कर रहे थे, लेकिन पर्दे पर नायक बनने की उनकी इच्छा अधूरी रह गई इसलिए उन्होंने स्वयं निर्माता-निर्देशक बनकर फिल्म ‘चला मुरारी हीरो बनने’ बनाई। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘हम नहीं सुधरेंगे’ और ‘सलाम मेमसाब’ जैसी फिल्में भी बनार्इं और अभिनेत्री मंजू बंसल से प्रेम विवाह किया। परंतु अफसोस, उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ।
अभिनय के मैदान में अपनी अलग छाप छोड़नेवाले फिल्म ‘शोले’ के जेलर असरानी को भला कौन भूल सकता है। हिंदी के साथ कुछ गुजराती फिल्मों में काम करनेवाले असरानी न तो दोस्तों के घर जाते थे और न ही उन्हें अपने घर बुलाते थे। किसी फिल्मी पार्टी या अंतिम संस्कार पर जाना भी वो अक्सर टाल देते थे। शायद इसलिए उन्होंने २० अक्टूबर की सुबह अपनी पत्नी मंजू से कहा था, ‘मैं मर जाऊं तो मेरे अंतिम संस्कार पर किसी को मत बुलाना।’ उनकी मौत पर सचमुच ऐसा ही हुआ। उनकी मौत की खबर दोस्तों और शुभचिंतकों को उनके अंतिम संस्कार के बाद मिली।

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