-तड़प रहे मरीज, मशीनें ठप, दवाएं हैं गायब, टॉयलेट जाम, वार्डों में घूम रहे आवारा कुत्ते
कागजों पर ९६ डॉक्टर, पर वार्डों में खामोशी मनपा का दावा, ‘कंट्रोल में है सब’
धीरेंद्र उपाध्याय
मुंबई के कुर्ला स्थित खान बहादुर भाभा अस्पताल में हालात दिन-ब-दिन बिगड़ते जा रहे हैं। इलाज के नाम पर यहां अव्यवस्था और लापरवाही का बोलबाला है। मनपा के अधीन आने वाला यह अस्पताल अब इलाज नहीं, बदइंतजामी का प्रतीक बन चुका है। अस्पताल में जहां कभी मरीजों को किफायती और गुणवत्तापूर्ण उपचार मिलता था, वहीं अब दवाओं की भारी कमी, खराब उपकरण, गंदगी और स्टाफ की लापरवाही मरीजों की परेशानी को बढ़ा रही है। मरीज तड़प रहे हैं, मशीनें ठप हैं और दवाएं गायब रहती हैं, यही भाभा अस्पताल की हकीकत बन गई है। अस्पताल के चार फार्मेसी काउंटरों में से सिर्फ एक सीमित समय के लिए खुलता है। स्टॉक खत्म का जवाब मरीजों की रोजमर्रा की तकदीर बन चुका है। जिन इंजेक्शनों और दवाओं की जरूरत तत्काल होती है, उन्हें बाहर से खरीदना मजबूरी है। गरीब मरीजों के लिए यह बोझ असहनीय साबित हो रहा है। दूसरी तरफ कागजों पर ९६ डॉक्टर हैं, लेकिन हकीकत में वार्डों में सन्नाटा पसरा है। कई विभागों में डॉक्टरों के देर से आने या अनुपस्थित रहने की शिकायतें आम हैं। घंटों तक लाइन में खड़े रहने के बाद भी मरीजों को परामर्श नहीं मिल पाता। अस्पताल प्रशासन का दावा है कि कर्मचारियों की संख्या पर्याप्त है और सब कुछ कंट्रोल में है, लेकिन मरीजों और उनके परिजनों का अनुभव इसके बिल्कुल उलट है। जाम टॉयलेट, बदबूदार वार्ड और आवारा कुत्ते ये दृश्य किसी बदहाल सरकारी इमारत के नहीं, बल्कि एक चालू अस्पताल के हैं। महिला मरीजों के लिए यह स्थिति और भी पीड़ादायक है, क्योंकि अस्पताल परिसर के बाहर कोई सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध नहीं है।
बाहर से खरीदनी पड़ रही दवाएं
एक अन्य मामले में भाभा अस्पताल में भर्ती नसरीन बानो को एक खास इंजेक्शन की जरूरत थी। उनके पति को बाहर से इंजेक्शन लाने को कहा गया, क्योंकि अस्पताल में पिछले १५ दिनों से स्टॉक खत्म था। ये कोई अनोखी घटना नहीं है। मुंबई के पूर्व उपनगर में स्थित ९० साल पुराने इस अस्पताल में कई मरीज ऐसी ही चुनौतियों का सामना करते नजर आते हैं।
स्टॉक से बाहर की दवाइयां
पूर्व नगरसेवक व मनपा स्वास्थ्य समिति की पूर्व सदस्य दिलशाद अशरफ आजमी ने आरोप लगाया कि भाभा अस्पताल पिछले डेढ़ साल से दवाओं की भारी कमी से जूझ रहा है। आजमी ने कहा कि हर बार २५ लाख रुपए की दवाइयां स्पॉट कोटेशन के जरिए खरीदी जा रही हैं। लेकिन नियमित या स्थाई आपूर्ति नहीं हो रही है। मरीजों को अक्सर बाहर से दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है, जो कभी-कभी असंभव भी हो जाता है, क्योंकि ज्यादातर मरीज गरीब और वंचित होते हैं।
९६ डॉक्टर मौजूद, फिर भी लंबा इंतजार
अस्पताल प्रशासन के अनुसार, यहां ९६ डॉक्टर कार्यरत हैं, जिनमें १२ स्थाई और ८४ संविदा पर हैं। इस पर्याप्त संख्या के बावजूद मरीज अक्सर कुछ विभागों में परामर्श के लिए लंबे इंतजार की शिकायत करते हैं। आरोप लग रहे हैं कि कई डॉक्टर देर से आते हैं, जिससे मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। अस्पताल लगभग सभी विभागों में कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है। इसके साथ ही मरीजों को इन कर्मचारियों द्वारा दुर्व्यवहार का भी सामना करना पड़ रहा है।
कभी गुणवत्तापूर्ण मिलता था उपचार
अस्पताल आने वाले कई मरीजों ने भी ऐसी ही चिंताएं जताई हैं। इलाके के सामाजिक कार्यकर्ता अकील खटीक ने बताया कि कभी गुणवत्तापूर्ण इलाज के लिए जाना जाने वाला यह अस्पताल अब भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है। उन्होंने कहा कि मरीजों को डॉक्टरों द्वारा लिखी गई सभी दवाइयां शायद ही कभी मिलती हैं। अस्पताल परिसर में मुफ्त दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए चार काउंटर तो हैं, लेकिन ओपीडी के समय सिर्फ एक ही खुला रहता है, जिससे लंबी कतारें लग जाती हैं। शाम और रात में कई बार सभी काउंटर बंद रहते हैं, जिससे मरीजों के परिजनों को घंटों इंतजार करना पड़ता है या बाहर से दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं।
