मुख्यपृष्ठस्तंभकाहें बिसरा गांव : चलऽ-चली काटि आइ धान

काहें बिसरा गांव : चलऽ-चली काटि आइ धान

पंकज तिवारी

‘चल काटि आइ भोरहीं में धान किसान के निशानी हऽ…’ बड़े ही मधुर आवाज में गाते हुए काकी कका को उठाने ही गई थीं कि बढ़िया भोरहिंया के नींद में खोये कका भड़क उठे। सेहलावन बढ़ी हुई थी, कंबल के स्थान पर अब रजाई की महत्ता समझ में आने लगी थी, दरकार थी रजाई की पर फटी हुई रजाई को अभी तक न सिला पाने के चक्कर में कंबल से ही काम चलाना पड़ रहा था उसमें भी खलल बनकर आ गई थीं काकी। कका का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, वो झटके में उठे और भाग कर दुआरे आ गए वहां रखे खटिया पर उछल कर बैठ गए। कका लगातार बड़बड़ाए जा रहे थे- ‘न चलब धान काटइ जाऽ, जवन करइ के होए कइ लिहू… लड़िका-बच्चन के खाइके आंटइ चाहे न आंटइ… का हमहिन सबके ठीका लिहे हई का… ससुरे गांउ-घर छोड़िके परदेश छाए हयेन, कभंउ अउबउ करथेन त मेहमाने की नाइ अइहीं छांह भरे कऽ अउर फेरि गायब होइ जइहीं, उहउ समय देखि के आवथेन कि जहिया काम-धाम से रचिकउ पाला न पड़ई मुला जात कर्इं बोरिया भरि-भरि के चाउर-पिसान गठियाइ लेइहीं, सेरका, खटाई कऽ झोला अलग से तैयार कइ लिही जाथऽ, गुड़-खांड़-तेल कुलि, काउ पाई गठियाइ लेई… वाली हाल होइ जाथऽ…’ कंबल के बिन या गुस्से की वजह से कका कांप रहे थे और चिल्लाए जा रहे थे। काकी अचानक से हुए इस प्रहार से एकदम से डर गई थीं। एकटक बस उन्हें ही निहारे जा रही थीं। इनका ऐसा रूप तो कभी देखा ही नहीं था। काकी बेचारी परेशान कि अब क्या ही किया जाए। ‘रूठे-रूठे पिया मनाऊं कैसे?
‘रूठ जाऊं कैसे?’ वाली हाल में तो नहीं आर्इं काकी, बल्कि गुस्से में नहाकर दरांती हंसिया वहीं उनके बगल ही रखकर बिना कुछ बोले ही चुपचाप घर में चली गर्इं। अब तक अगल-बगल के दो, चार, दस लोग इकट्ठे भी हो गए थे। कका अभी भी तमतमाए तवे की भांति जल रहे थे, जहां पानी के चार-छह छींटे पड़ते ही वो उबल पड़ रहे थे। लोग अगल-बगल से कुछ देर देखे और अपने-अपने घर को चलते बने। काकी घर के कामों में भिड़ा गई थीं। समय बीतने के साथ ही कका का दिमाग भी कुछ ठंडा हुआ और अपने किए पर पछतावा भी हुआ। अब उनका दिमाग काकी से बतियाने हेतु तमाम नुस्खे खोजने लगा था, वैâसे पास जाते ही ‘चल काटि आइ भोरहीं में धान किसान के निशानी हऽ’ गायेंगे और काकी को मनाएंगे, समझाएंगे कि किसी को भी गहरी नींद से उठाना कितना गलत काम होता है। दिन-रात खटते-खटते तो वैसे भी सोने के लाले पड़े रहते हैं, ऐसी नींद तो कभी-कभी ही नसीब होती है, उसको भी तुम ऐसे ही उड़ाने के फेर में थीं। कहेंगे कि ‘यंह बेरी बरे त हम गलती मानथई मुला कृपा कइके अगले बेरी से कभंऊ हमार नींद खराब करइ के गलती जिनि कइ दिहू…। ई हम समझावथई कि हड़कावथई… ना… नाहीं एस न कहब, रचिके अउर नरम बोली-भासा में बतियाब तब बात बनि पाये।’ कका बोलने, मनाने की खूब प्रैक्टिस करने के बाद काकी के पास पहुंच गए। काकी मस्त हो अपने काम में लगी रहीं। कौआ मुंडेर पर जोर-जोर से चिल्लाए जा रहा था और उछलते-कूदते अपने पैर उठाए बार-बार अपनी जगह बदलता जा रहा था। उधर आंगन में लगे नल के पास रखे कुछ बर्तनों को चाटने में कुत्ते भिड़े हुए थे। आखिरकार, काकी का ध्यान अपनी ओर खींचने का एक बहाना कका को मिल ही गया था। दोर्र-दोर्र… धत्… कहते हुए कका कुत्ते को दौड़ा लिए। बेचारे गुर्राहट भरे शब्दों के साथ, कका को घूरते हुए पीछे की ओर से बाहर भागे। कका की आवाज सुनते ही काकी झट से उठ बैठी और बर्तन मांजने को दौड़ पड़ीं। कका झपट कर काकी का हाथ धर लिए। अरे… अरे… कहते हुए काकी अपना हाथ छुड़ाने लगीं। ‘अरे इ काऽ हउ हो ललवा के बाबू?’ ‘हां… हां… इहइ सही हउ हो ललवा के माई, अब ई बर्तन तूं नाइ बलुक हम धोउब।’ ‘का…?’- काकी घबरा उठी। अब ई नया बखेड़ा कहां से आ टपका। ‘कहोऽ… तू भांग-वांग त नाइ खाइ लिहेऽ हयऽ आज…? कि हमहिन सपना देखथई। तूं अउर बर्तन मजबऽ। सुरुज देव केहर से उवेन आज?’ काकी मंद-मंद मुस्कराहटों के साथ कका से बोले जा रही थीं, जबकि कका अपने किए पर शर्मिंदा थे।
क्रमश:
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)

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