मुख्यपृष्ठस्तंभअवधी व्यंग्य : ट्रेन कऽ सफर

अवधी व्यंग्य : ट्रेन कऽ सफर

एड. राजीव मिश्र मुंबई
एक महीना गजोधर के बदे एक साल के बरोबर लागि रहा है। एक-एक दिन काटब भारी होइ रहा है। आखिर पहिली बार दिल्ली जाई रहें हैं, उहौ सीट रिजब कराइ के। तीन महीना पहिले १,००० रुपिया टिकट के ऊपर देइके नीचे वाली सीट के रिजर्वेशन कराए और पूरे गाँव मे ई खबर पहुंचाई दिहेन कि नीचे वाली सीट के रिजर्वेशन होइ गवा है। सुबह-सुबह भुलई चचा गजोधर के इहाँ पहुँचे और बोले- का हो गजोधर! सुनय में आवा है दिल्ली जाय रहे हौ? हाँ चाचा, अब घर बइठे खर्च तो चली न, परदेश तो हम लोगन के किस्मत में लिखा है। उ तो ठीक है पर सुनय में आवा है नीचे के सीट मिली है? गजोधर गर्व से सीना फुलाइ के कहें, चचा एक हजार जियादा दिए हैं तब मिला है। अब जवन भी होय, नीचे वाली सीट भागिमानन के मिलत है। मस्त खिड़की के पास बईठो, नदी नाला, खेत कियारी, पहाड़ में मजा लेति सफर करो। हाँ चचा, ई तो है। आखिर सफर के आनंद के खियाल में उ दिन आइ गवा। गजोधर सर-समान लइके स्टेशन पहुँचे। गाड़ी चार घंटा लेट रही। अब एक ओर गजोधर सोचे रहें कि ४ बजे संझा से रात तक खिड़की से बाहर के नजारा देखब उ सपना चकनाचूर होइ गवा। आखिर गाड़ी आई, गजोधर आपन बाकस और झोरा लइके सबके ठेलत-ठालत कइसउ अपने सीट तक पहुँचे, उहाँ पहुँचे के बाद देखत हैं कि उनकी सीट पर एक ठो बुढ़िया माई ओढ़ि-बीढ़ि के सोई हैं। उनकी पतोह उनके पैर की तरफ बइठी है। गजोधर, भौजी ई सीट हमार है। भउजी आपन एक हाथ दाँत से दबाइ के मुस्कियात बोली, हाँ पता है देवर जी, पर तुम्हारी चाची अउर हमरी सास के तबियत ठीक नही है। तुम अबहीं हमरे बगल में बइठि जाओ रात मा हमरी सीट पर सोइ जायो। गजोधर के आपन खिड़की के मोह पर गरहन लागत देखाइ पड़ा। खैर, राति के जब गजोधर भउजी से पूछे कि भउजी, आपके सीट कवन है। देवर जी, हमका लागत है हमार सीट कन्फर्म नही भई एक काम करो आप ई अखबार बिछाइके दूनउ सीट के बीच मा सोई जाओ। दुइ दिन के जिनगी है अउर एक रात के सफर कहिके गजोधर के अखबार पकड़ाइ के भउजी मुँह ढाँकि के सोइ गयी।

अन्य समाचार