सामना संवाददाता / नई दिल्ली
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने ९ सितंबर को मुंबई उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को यह बताने का निर्देश दिया था कि शुभम गणपति उर्फ गणेश राठौड़ के खिलाफ जुलाई २०२१ में आरोप पत्र दायर किए जाने के बावजूद मुकदमा क्यों शुरू नहीं हुआ। पीठ ने रजिस्ट्रार जनरल को महाराष्ट्रभर के अन्य विचाराधीन वैâदियों के आंकड़े एकत्र करने का भी निर्देश दिया था, जिनके आरोप चार या उससे अधिक वर्ष पहले आरोप पत्र दायर किए जाने के बावजूद लंबित रहे। पिंपरी-चिंचवड़ में एक हत्या के मामले में आरोपी राठौड़ को अप्रैल २०२१ मेंगिरफ्तार किया गया था। उसने मई २०२५ में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें मुंबई हाई कोर्ट के २०२४ के आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उसे जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।
९ सितंबर को राठौड़ की याचिका पर सुनवाई करते हुए, सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा था कि मुकदमे से पहले उसकी लंबी हिरासत संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत गारंटीकृत त्वरित सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। पीठ ने कहा कि राठौड़ चार साल से ज्यादा समय से हिरासत में है, फिर भी उसकी स्थिति वैसी ही बनी हुई है, जैसी उसकी हिरासत के पहले दिन थी। पीठ ने उच्च न्यायालय को देरी के कारणों का पता लगाने और राज्यभर में इसी तरह के सभी मामलों की जांच करने का निर्देश दिया।
रजिस्ट्रार जनरल का हलफनामा
गत ७ अक्टूबर को उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल ने अनुपालन में एक हलफनामा दायर किया था। शीर्ष अदालत ने हलफनामे की विषयवस्तु को चिंताजनक पाया, क्योंकि आरोप तय करने में देरी के मुख्य कारण अभियुक्तों की गैर-हााजिरी, विभिन्न याचिकाओं और आवेदनों का लंबित रहना, वकीलों की अनुपस्थिति और अभियुक्तों द्वारा आरोपों पर हस्ताक्षर करने से इनकार करना थे।
कैदियों की पेशी अनिवार्य
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘हलफनामे से पता चलता है कि कम से कम ६४९ मामले ऐसे हैं, जिनमें आरोप पत्र दाखिल होने के बावजूद, वर्ष २००६, २०१३, २०१४ और उसके बाद से वर्ष २०२० तक आरोप तय नहीं किए गए हैं।’ शीर्ष अदालत ने इस बात पर गौर किया कि उच्च न्यायालय ने इस वर्ष की शुरुआत में ही परिपत्र जारी कर विचाराधीन वैâदियों की अनावश्यक स्थगन से बचने के लिए भौतिक या आभासी पेशी अनिवार्य कर दी थी और जानना चाहा था कि क्या उन निर्देशों का अक्षरश: पालन किया जा रहा है।
