मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : बिहार में ओवैसी बिगाड़ रहे महागठबंधन का खेल

इस्लाम की बात : बिहार में ओवैसी बिगाड़ रहे महागठबंधन का खेल

सैयद सलमान, मुंबई

बिहार की चुनावी राजनीति में इस बार भी मुस्लिम मतदाताओं को लेकर जबरदस्त खींचतान देखने को मिल रही है। इसे महज वोट बैंक की राजनीति का प्रश्न नहीं कहा जा सकता। यह सामाजिक और वैचारिक ध्रुवीकरण की वह झलक है, जो लंबे समय से धीरे-धीरे पनप रही है। पिछले विधानसभा चुनाव में ओवैसी ने सीमांचल में ५ विधायक जिताकर खलबली मचा दी थी। इस बार भी असदुद्दीन ओवैसी ‘खेला’ करने के मूड में हैं। उन्होंने अपने विशेष राजनीतिक दृष्टिकोण और भाषाई तीखेपन से जिस ‘मुस्लिम प्रतिनिधित्व’ की बहस को हवा दी है, उसने महागठबंधन के पारंपरिक समीकरणों को चुनौती दे दी है।
बिहार में ओवैसी की पार्टी ३२ सीटों पर मैदान में है। संख्या भले सीमित हो, पर इन सभी सीटों का चयन खास रणनीतिक तौर पर किया गया है। इनमें ज्यादातर वे क्षेत्र हैं जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक है और जहां पहले वोट महागठबंधन के पक्ष में लगभग एकमुश्त पड़ते रहे हैं। यही वह बिंदु है जहां ओवैसी का ‘साढ़े तीन प्रतिशत बनाम सत्रह प्रतिशत’ वाला नैरेटिव असर पैदा करता है। एक ऐसा आंकड़ा, जो मुसलमानों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि राजनैतिक साझेदारी में उनकी हिस्सेदारी प्रतिनिधित्व के अनुपात में क्यों नहीं है।
दोहरी रणनीति
ओवैसी का यह तर्क उन मतदाताओं के बीच तेजी से पैâल रहा है, जो अपने वोट को सिर्फ ‘महागठबंधन बनाम एनडीए’ की मजबूरी में नहीं, बल्कि अपनी पहचान और स्वाभिमान के संदर्भ में देखना चाहते हैं। यही वह दुविधा है जो बिहार के मुस्लिम मतों को दो राहे पर खड़ा कर रही है। एक ओर उन्हें यह समझ है कि विखंडन राजनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकता है, दूसरी ओर यह भावना भी मजबूत हो रही है कि दशकों से समर्थन देने के बावजूद उन्हें सिर्फ ‘गिनती का फायदा’ मिला, बराबरी का प्रतिनिधित्व कभी नहीं मिला।
महागठबंधन के लिए यह स्थिति उलझन भरी है। अब तक जो मुस्लिम समर्थन उसका स्वाभाविक हिस्सा माना जाता रहा, उसमें अब ‘विकल्प’ की भावना घर कर रही है। ओवैसी का भाषण भले ही आक्रामक लगे, लेकिन उसमें वे मुद्दे हैं जो उन वर्गों को आकर्षित करते हैं, जिन्हें लगता है कि उनकी सामाजिक सुरक्षा और राजनीतिक भागीदारी, दोनों खतरे में हैं। महागठबंधन के नेता इस चुनौती को ‘वोट काटने की साजिश’ बताकर खारिज करना चाहते हैं, लेकिन यह तर्क उन मतदाताओं पर असर नहीं डाल रहा जो आत्म-सम्मान की राजनीति में विश्वास जताने लगे हैं।
ओवैसी की रणनीति का केंद्रबिंदु दोहरा है। पहला, अपने आप को ‘ना एनडीए, ना महागठबंधन’ के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करना और दूसरा, यह संदेश देना कि मुस्लिम समाज को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज उठानी चाहिए। जाहिर है कि यह सीधा हमला उस विचार पर है जो कहता है कि धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए मुस्लिम वोट को एकजुट रहना चाहिए। ओवैसी इसके उलट यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या धर्मनिरपेक्षता सिर्फ तब तक सुरक्षित है जब तक मुस्लिम वोट एकजुट होकर किसी अन्य पार्टी को सत्ता में पहुंचाते हैं?
महज वोट बैंक नहीं
बिहार की राजनीति में शहाबुद्दीन जैसे नेताओं का प्रभाव एक समय मॉडल की तरह देखा जाता था। वे अपराध की दुनिया से निकलकर संसद तक पहुंचे और अपने समर्थकों के बीच ‘नायक’ की छवि बने रहे। ओवैसी अब उसी पहचान को अपराध और प्रभाव की जगह, तर्क और प्रतिनिधित्व की राजनीति के जरिए नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका यह प्रयोग फिलहाल सीमित सीटों तक है, लेकिन उसकी राजनीतिक तरंगें राज्य भर में महसूस की जा रही हैं।
महागठबंधन की प्रमुख कमजोरी यह रही है कि वह मुस्लिम मतदाताओं से संवाद के अपने पारंपरिक ढांचे का समयानुकूल आधुनिकीकरण नहीं कर पाया है। उसके पुराने नारे अब भावनात्मक असर नहीं छोड़ते। युवा और शिक्षित मुस्लिम वर्ग अब सीधे सवाल पूछता है कि उसका वास्तविक प्रतिनिधित्व कहां है? क्यों विधानसभा और मंत्रिमंडलों में उनकी उपस्थिति उनकी आबादी के अनुपात में नहीं दिखाई देती? ओवैसी की राजनीति इसी असंतोष को जुबान देती है।
हालांकि, बिहार का सामाजिक ताना-बाना बहुत पेचीदा है। मुस्लिम वोटर धार्मिक पहचान, जातीय और स्थानीय समीकरणों से भी प्रभावित होता है। कई सीटों पर ओवैसी की मौजूदगी महागठबंधन के प्रत्याशी की हार का कारण बन सकती है। इस पूरी सियासत का सार यही है कि बिहार का मुस्लिम समाज अब अपने राजनीतिक भविष्य पर खुलकर सोचने लगा है। यह सोच चाहे ओवैसी की पार्टी को सीमित लाभ दे, लेकिन वह इस तथ्य को रेखांकित करती है कि प्रतिनिधित्व की सियासत अब भावनाओं से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। मुसलमान अब महज वोट बैंक नहीं बने रहना चाहते, बल्कि अपनी सामाजिक हिस्सेदारी का हिसाब भी मांग रहे हैं। बिहार का चुनाव इस नई मानसिकता का खुला मंच साबित हो सकता है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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