सामना संवाददाता / मुंबई
सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे पदों पर अधिकारियों के तबादलों में घोटालों और राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए महाराष्ट्र सहित सभी राज्यों में सिविल सर्विसेज बोर्ड की स्थापना अनिवार्य की थी। कुंभार ने पूछा कि यह व्यवस्था येवले मामले में क्या कर रही थी? क्या इस व्यवस्था को दरकिनार कर येवले का तबादला किया गया?
येवले के पराक्रम के कुछ चौंकाने वाले पहल
वर्ष २००१ की राज्य सेवा परीक्षा में ३९८ उम्मीदवारों की उत्तर पुस्तिकाएं बदलने का घोटाला सामने आया था, जहां हर उम्मीदवार से ३-५ लाख रुपए लिए जाने के आरोप थे। वर्ष २०११ में नागपुर के उमरेड में १०,००० रुपए की रिश्वत लेते पकड़े गए। ६ आरोपपत्र दायर किए गए, लेकिन जांच का कोई पता नहीं। वर्ष २०१४ में चंद्रपुर जिले के सिरोंचा में कोतवाल भर्ती मामले में प्रत्येक उम्मीदवार से २-२.५ लाख रुपए रिश्वत लेने के आरोप लगे। वर्ष २०१६ में इंदापुर तहसीलदार के रूप में ५८ सरकारी जमीनों का अनियमित आवंटन और रेत माफिया के साथ सांठगांठ के आरोप लगे।
‘सेटिंग’ से बचे हर बार
येवले पर १४ वर्षों में ७ बार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे, लेकिन हर बार सेटिंग लगाकर वे बच निकले। मोबोज होटल जमीन घोटाला और मुंढवा जमीन घोटाला समेत कई मामलों में उनके खिलाफ आरोप लगे, आंदोलन हुए, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। विजय कुंभार ने आरोप लगाया कि येवले मुंढवा जमीन घोटाला में अमेडिया कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए खासे सक्रिय थे।
