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संपादकीय : बाल मृत्यु का कलंक!

महाराष्ट्र में कुपोषण की गंभीर समस्या ने एक बार फिर सिर उठा लिया है। पिछले पांच महीनों में महाराष्ट्र में कुपोषण के कारण ६५ बच्चों की मौत हो चुकी है और इस शर्मनाक वाकये के बावजूद सरकार इन बाल मौतों को गंभीरता से लेती नजर नहीं आ रही है। राज्य के दूर-दराज इलाकों में आदिवासी बच्चे कुपोषण के कारण मर रहे हैं और गैंडे की खाल वाली सरकार आंखें मूंदे बैठी है। क्या सरकार सोचती है कि गरीब परिवारों के बच्चों के जीवन का कोई मूल्य नहीं है? कुपोषण के कारण होनेवाली ये बाल मौतें सरकार की निष्क्रियता का शिकार हैं और इसीलिए मुंबई हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र में इन बाल मौतों को गंभीरता से लिया है और राज्य सरकार को बुरी तरह से लताड़ा है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा, ‘सरकार की अक्षमता के कारण पिछले पांच महीनों में ६५ बच्चों की बेवजह मौत हो चुकी है और सरकार का इस मामले में रवैया अभी भी बेहद गैर-जिम्मेदाराना है।’ न्यायमूर्ति रेवती मोहिते-डेरे और न्यायमूर्ति संदेश पाटील की पीठ ने न केवल सरकार को फटकार लगाई, बल्कि लोक स्वास्थ्य, आदिवासी विकास, महिला एवं बाल कल्याण और वित्त विभागों के प्रमुख सचिवों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का भी आदेश दिया। इन सभी प्रमुख सचिवों को २४ नवंबर को अदालत में पेश होना है और
६५ बच्चों की मौत के बाबत
हलफनामे भी पेश करने हैं। अगर कुपोषण और बाल मृत्यु दर की बढ़ती घटनाओं से सरकार का दिल नहीं पसीज रहा हो तो किसी को हंटर हाथ में ले लेना चाहिए। लाश बन चुकी संवेदनहीन सरकार पर यह चाबुक चलाने के लिए अदालत को धन्यवाद देना चाहिए। इन दिनों यह आरोप आम है कि अदालतें सरकार विरोधी रुख अपनाने से कतराती हैं। न्यायिक सक्रियता के आरोप अब बंद हो गए हैं। उलटे, न्याय के बजाय सरकार की गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिशें ज्यादा हो रही हैं। दबाव के ऐसे माहौल में भी, यह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण बात है कि अदालत कम से कम कुपोषण जैसे सामाजिक मुद्दों पर ध्यान दे और सरकार को उसके कर्तव्य का बोध कराए। बेशक, यह सिर्फ इसलिए संभव हुआ क्योंकि बंडू साने, डॉ. राजेंद्र बर्मा, डॉ. अभय बंग जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मेलघाट में कुपोषण से बच्चों की मौतों को रोकने के लिए जनहित याचिका दायर करके ‘जागृति’ की भूमिका निभाई, जिसके कारण बच्चों की मौतों का यह भयावह मामला और इसके प्रति सरकार की उदासीनता अदालत तक पहुंच पाई। सात महीने पहले के आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में १ लाख ८२ हजार ४४३ बच्चे कुपोषित थे। इनमें से लगभग
३१ हजार बच्चे
कुपोषण की तीव्र श्रेणी के पाए गए, जबकि मध्यम श्रेणी में १.५ लाख बच्चे कुपोषित पाए गए। फिर कुपोषण अब आदिवासी इलाकों तक सीमित नहीं है, राज्य में कुपोषित बच्चों की सबसे ज्यादा संख्या, १६,३४४, मुंबई के उपनगरीय इलाकों में दर्ज की गई है। जब कुपोषण का संकट इतना विकट हो तो सरकार को कुपोषण से लड़ने के लिए आहार, स्वास्थ्य और पोषण के त्रिसूत्र का उपयोग करना चाहिए, लेकिन अगर सरकार और अधिकारी लोगों के स्वास्थ्य की तुलना में स्वास्थ्य विभाग के टेंडरों में अधिक रुचि रखते हैं तो वे कुपोषण की समस्या से वैâसे निपटेंगे? राज्य में कुपोषण और बाल मृत्यु दर के आंकड़े महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य के लिए शर्मनाक हैं। जब मेलघाट और राज्य के अन्य दूर-दराज के इलाकों में कुपोषण के कारण तड़प-तड़प कर बच्चे मर रहे हैं तो सरकार वास्तव में क्या कर रही है? क्या आदिवासी इलाकों के गरीब लोग, पाड़ा, वाडी और बस्तियों में रहनेवाले आम लोग महाराष्ट्र की प्रजा नहीं हैं? अगर हम इन पाड़ों में बच्चों को इतना अच्छा खाना भी नहीं दे सकते कि वे कम से कम जिंदा रह सकें तो सरकार में शामिल हुक्मरानों को पहले यह मान लेना चाहिए कि वे बदनसीब, नकारे मनहूस हैं। कुपोषण के कारण बच्चों की मृत्यु एक कलंक है। क्या सरकार समृद्ध महाराष्ट्र के माथे पर लगे इस कलंक को हमेशा के लिए मिटाने के लिए कुछ करेगी?

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