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भाजपा के चक्रव्यूह में फंसे शिंदे! … कडोंमपा तक सीमिति नहीं रहेगा ऑपरेशन लोटस

सामना संवाददाता / मुंबई
भाजपा और उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बीच चल रही खींचतान की खबरें नई नहीं हैं। देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद मिलने के बाद से शिंदे नाखुश हैं। इसी असंतोष के चलते वे कभी-कभार सातारा के अपने गृहनगर में जाते रहते हैं। अब मीडिया भी इस असंतोष पर कम ही ध्यान देता है। हालांकि, एक हफ्ते पहले हुए कुछ घटनाक्रमों से यह साफ हो गया कि शिंदे और भाजपा के कुछ नेताओं के बीच काफी अनबन है।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण ने कल्याण-डोंबिवली मनपा क्षेत्र के १२ पूर्व पार्षदों को भाजपा में शामिल करवा लिया। चव्हाण ने यह सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश की कि अपने-अपने वॉर्डों में प्रभावशाली माने जानेवाले ये स्थानीय नेता सांसद डॉ. श्रीकांत के प्रभाव में न आएं। इस पृष्ठभूमि में अब चर्चा है कि शिंदे के गढ़ में चव्हाण के माध्यम से भाजपा द्वारा नियोजित ऑपरेशन लोटस कल्याण, डोंबिवली तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि अन्य शहरों में भी चलाया जाएगा, ऐसा भाजपा सूत्रों ने बताया।
अब बदला ले रहे है चव्हाण
बता दें कि जब एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने ठाणे जिले के लगभग सभी शहरों पर एकछत्र नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश की थी। शिंदे के मुख्यमंत्री रहते हुए भाजपा ने लोक निर्माण विभाग जैसा प्रभावी विभाग रवींद्र चव्हाण को सौंप दिया। एक तरह से भाजपा ने चव्हाण को शक्ति प्रदान की थी। हालांकि, शिंदे पिता-पुत्र ने उन ढाई वर्षों में भी चव्हाण को डोंबिवली में कुछ खास करने नहीं दिया। चव्हाण उस समय पालघर के पालक मंत्री थे।

संगठन को मजबूत करने की पूरी छूट
भाजपा ने चव्हाण को पालघर सहित कोकण क्षेत्र में पार्टी संगठन को मजबूत करने की पूरी छूट दी। उन्हें निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गई, लेकिन ठाणे और डोंबिवली में चव्हाण को प्रशासनिक कार्यों के लिए अधिक गुंजाइश नहीं दी गई। मंत्री होने के बावजूद, कल्याण-डोंबिवली मनपा में चव्हाण के आदेश और सुझाव बहुत मूल्यवान नहीं थे। अब चव्हाण को मौका मिला है और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के इशारे पर क्रमश: पिता-पुत्र से बदला लेने की शुरूआत कर दी, ऐसी राजनीतिक गलियारे में चर्चा है।

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