हृदयनारायण दीक्षित
जिज्ञासा अनूठी नायिका है। ज्ञान उसका नायक है। वह ज्ञान के प्रेम में बेचैन रहती है। यह नायिका-नायक के रूप-नाम पर मोहित नहीं होती। वह रूप के पीछे छुपे कारण को जानने के लिए बेचैन रहती है। उसे रूप ज्ञान चाहिए, स्वरूप ज्ञान चाहिए, अरूप का बोध चाहिए। प्रकृति का कारण ज्ञान चाहिए, सृजन का ज्ञान चाहिए और विसर्जन का भी ज्ञान चाहिए। वह सदा अतृप्त नायिका है। उसकी दृष्टि सभी दिशाओं में है, समय की सत्ता के भीतर है, लेकिन वह समय की सत्ता का अतिक्रमण करके भी ज्ञान पाना चाहती है। जान पड़ता है कि हम सब प्राणी जैविक भूख, प्यास के साथ ही ज्ञान की प्यास लेकर भी पैदा हुए हैं। मैं अबोध शिशु था, पिता की मूंछों को पकड़ता था, बिना बोले ही प्रश्न करता था? आपकी ही तरह हमारे मूंछ क्यों नहीं है? थोड़ा बड़ा हुआ, बंदर का नाच देखा। पिताजी से प्रश्न पूछा, ‘बंदर की तरह हमारे पास पूंछ क्यों नहीं है?’ कुत्तों को देखा कुत्ते सूंघते हुए चलते हैं। पता करते हैं कि शायद कहां क्या है? वे बहुत ध्यान लगाकर सुनते हैं। कीट-पतिंग भी उड़ते हुए किसी न किसी शोधयात्रा पर गतिशील दिखाई पड़ते हैं। पक्षी भी संभवत: आकाश ज्ञान के भूखे हैं। वे इसी जानकारी के लिए बहुत ऊंचे उड़ते हैं। नदियां लगातार भागती हैं, लगातार खोजते हुए सागर को। अग्नि ऊर्ध्वगमन करते हैं, किसी अज्ञात जिज्ञासा में ही शायद।
मनुष्य जिज्ञासु है। शिशु जन्म के समय अबोध रहता है। फिर इंद्रिय बोध बढ़ता है, मां का परिचय आदि अनादि है और प्रगाढ़ है। कमोवेश पिता का भी। शिशु का इंद्रिय बोध संसार में रूप देखता है। प्रश्न प्रतिप्रश्न उठते हैं। शिशु हृदय में विस्मय बोध उगता है। कौतूहल बढ़ता है और इसी से जन्म लेती है ‘जिज्ञासा’। बच्चे मां-पिता से प्रश्न करते हैं यह क्या है? वह क्या है? शिव के गले में सांप क्यों है? रावण के १० सिर क्यों हैं? भारत के देवरूप अतिरिक्त जिज्ञासु बनाते हैं? मां-बाप आस्था के हिसाब से उत्तर देते हैं। निशाना परिवेश होता है। जो सामने है, वही विस्मय है और वही जिज्ञासा है।
वनस्पतियां और कीट-पतिंग विस्मयकारी हैं। हमारा गांव सई नदी के किनारे है। पीपल, गूलर और जामुन के वृक्ष थे। गांव की महिलाएं उत्सवों पर गीत गाती थीं- सइयां गूलर का फूल होइगे। क्या बात है- गूलर के फूल में? पत्नियां अपने पति को गूलर का फूल क्यों बताती हैं? गूलर का स्वाद बड़ा मधुमय होता है, लेकिन ये फल नहीं, फूल का स्वाद है। फूल ही फल के रूप में चारों तरफ से बंद रहता है। गूलर के फूल के भीतर पुंकेशर-पुरुष होते हैं, इन्हीं से पराग निकलता है, थोड़ा अंदर की तरफ स्त्रीकेशर होते हैं, ये मादा हैं। वनस्पति विज्ञानी बरगद, पीपल व गूलर में एक जैसा पुष्प परागण देखते हैं।
संसार रूपों से भरा-पूरा। आकाश में जगमग चांद, तारे, ज्योतिर्मय सूर्य और पृथ्वी में वनस्पतियां, वन, उपवन। कुछ सचेतन रूप में तैयार किए गए पार्कों में, किसानों द्वारा लगाए गए बागों में। लेकिन ज्यादातर प्रकृति की स्वाभाविक शक्तियों द्वारा निर्मित हैं। प्रकृति पूरे मन से ही गढ़ती है। नदियां हैं। भरी-पूरी तरुण युवा नदियां आनंदमगन करती हैं। आकाश छूने को बेचैन पर्वत हैं, विंध्य पर्वत शृंखला प्राचीनतम है, यहां देवी उपासना का विंध्य-आंचल हैं। ऋषिकेश, बद्री, केदार लहालोट करते हैं। यहां, वहां, जहां, तहां झीलें हैं। गीत गाते चहचहाते रंगबिरंगे पक्षी हैं। पशुओं का विराट जगत है, हाथी, ऊंट, बकरी, भैंस और बंदर, कुत्ते हैं ही, करुणा और वात्सल्य का रूप गायें भी हैं। कीट-पतिंग हैं, उनके अपने चंचल हावभाव है। सांप, बिच्छू भी हैं। मनुष्य इन्हें देखता है, आश्चर्यचकित होता है।
प्रकृति मनगढ़ंत खेल करती है, जैसा मन में आया, वैसा गढ़ लिया। आम खाते हुए बड़ा मजा आता है, लेकिन धकापेल मिठाई के प्रवाह में गुठली मजा को बेमजा करती है। गुठली न होती, मीठा गूदा ही गूदा होता तो? केला खाते समय यह कठिनाई नहीं आती? अमरूद के बीज स्वाद में बहुत अड़ंगा नहीं डालते। तरबूज के बीज अलग न करो तो खाने का मजा ही बेकार। तरबूज भारी-भरकम होते हैं। जामुन छोटे लेकिन मधुरस से भरे हुए। मीठा महुआ भी फूल है। रस से लबालब रहता है। कहां से आता है यह रस? जिज्ञासा के कोष में प्रश्नों के साथ तर्क भी होते हैं। कहीं पढ़ा है एक चिंतक के बारे में। वे लेटे-लेटे अपनी झोपड़ी पर पैâली अंगूर की लता देख रहे थे, सुंदर रस भरे अंगूरों को देखते हुए बोले, ‘क्या बेवकूफी है, रस भरे अंगूर छोटे-छोटे और बिना रस के कद्दू भारी-भरकम। क्या ईश्वर नासमझ है? अगर समझदार होता तो ऐसी गलती न करता।’ इसी बीच एक पका रसभरा अंगूर उनके सिर पर गिरा, चेहरे पर रस पैâल गया। उन्होंने अपना निष्कर्ष बदला, ‘ठीक ही हुआ, अंगूर कद्दू जैसा होता तो खोपड़ी फट जाती, रस भी काटकर निकालना पड़ता। ईश्वर समझदार हो शायद?’ भयंकर शीत और कोहरे के दौरान हम सब शरीर ढंकते हैं। लेकिन नीम आदि पेड़ अपनी पत्तियां छोड़ देते हैं। क्या कारण है? क्या वे अपने वस्त्र उतारकर जाड़े को चुनौती देते हैं? आओ दो-दो हाथ करो। जाड़ा भाग जाता है, वे फिर नई पत्तियों में हहराते हैं।
वनस्पतियां मोहित करती हैं। घास हरी चादर सी। लेकिन दूब बिजली के तार जैसी? वनस्पतियों को पृथ्वी से रस चाहिए, लेकिन नीम और पीपल पर ‘अमरबेल’ चढ़ती है, इसकी अनेक प्रजातियां हैं। गुर्च/गुड़ूची भी इसी संप्रदाय की है। बंगाल में इसे ‘स्वर्णलता’ कहते हैं। यह हरे-पीले रंग के बिजली के तार जैसी होती है, जिस पेड़ पर लिपटती है, उसी से भोजन लेती है, छोटे-छोटे श्वेत फूल मनोहारी लगते हैं। छात्र जीवन में ऐसी सारी वनस्पतियां विस्मय देती थीं? लेकिन तुलसी के प्रति हमारी जिज्ञासा आज भी पैनी है। हमारी परंपरा में तुलसी की पूजा है। वैज्ञानिक बताते हैं कि इसकी गंध से अनेक कीटाणु दूर भागते हैं। मुझे यह प्रिय है और इसकी गंध अतिप्रिय है। पत्ती तोड़ने से डरता हूं। किसी जीवित सत्ता को अंगभंग करने में हमारी जिज्ञासा पर संवेदनशीलता की विजय होती है।
ज्ञान की शुरुआत का प्रथम तत्व है जिज्ञासा। दर्शन का मूल आधार भी जिज्ञासा ही है। वेदों को आस्था ग्रंथ कहा जाता है, लेकिन दुनिया का प्राचीनतम ज्ञान अभिलेख ऋग्वेद भी अतिरिक्त जिज्ञासा से भरापूरा है। ऋषि पूछते हैं ‘कोददर्श प्रथमंजायमान – प्रथम जन्मे परमतत्व को किसने देखा? जो अशरीरी होकर भी विशालकाय संसार का पोषण करता है?’ (ऋ. १.१६४.४) ऋषि सृष्टि की पहली किरण के बारे में जिज्ञासु है। लेकिन सूर्य की आभा ज्योतिर्मय है। पूछते हैं, ‘सूर्य अपनी किरणें वैâसे पैâलाते हैं। (वही, मंत्र ५) जानना चाहते हैं ‘इस धरती का अंतिम छोर कौन सा है? – पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्या:। सभी भुवनों का केंद्र कहां है? – पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभि: और वाणी का मूल उद््गम क्या है? – पृच्छामि वाच: परमे व्योम। (वही मंत्र, ३४) ऋग्वेद सहित संपूर्ण वैदिक साहित्य में इसी तरह की ढेर सारी जिज्ञासाएं हैं। यहां मान लेने का आग्रह नहीं है। रूप-परिवेश से उपजे प्रश्न हैं, प्रश्नाकुल चित्त से निर्मित जिज्ञासाएं हैं। फिर इन जिज्ञासाओं के समाधान की तार्किक दार्शनिक यात्रा है।
