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पुस्तक समीक्षा : भारतीय ज्ञान परंपरा की संवाहक हैं बांसुरी श्रृंखला की पाठ्य पुस्तकें

राजेश विक्रांत

इफ्तिख़ार आरिफ का एक शेर है- एक चराग और एक किताब और एक उम्मीद असासा, उसके बाद तो जो कुछ है, वो सब अफ्साना है। लेकिन यहां तो 9 किताबों की एक श्रृंखला ही है, जिसे डॉ. जितेंद्र पाण्डेय एवं उनकी टीम ने बांसुरी हिंदी पाठ्य पुस्तक एवं अभ्यास पुस्तिका श्रृंखला के नाम से तैयार किया है। ये प्रवेशिका से लेकर कक्षा आठवीं तक के लिए है। इसका निर्माण बुनियादी चरण (प्रवेशिका, पहली और दूसरी कक्षा), प्रारंभिक चरण (कक्षा 3, 4 और 5) और मध्य चरण (कक्षा 6, 7 और 8) को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 2020 के दिशा निर्देश के मुताबिक किया गया है।
हम सब जानते हैं कि बालमन कोरा कागज होता है। उस पर खींची गई लकीर वक्त के साथ गहरी होती जाती है और ताजिंदगी याद भी रहती है, लिहाजा “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी”, “चेतक की वीरता”, “हठ कर बैठा चांद एक दिन”, “उठो लाल अब आंखें खोलो, पानी लाई हूं मुंह धो लो”,”उठो धरा के अमर सपूतों”,” सुदर्शन की कहानी हार की जीत में बाबा भारती का घोड़ा चेतक”,”जलाओ दीए पर रहे ध्यान इतना” आदि पंक्तियां जेहन में रच बस जाती हैं। इसलिए बांसुरी श्रृंखला की अनेक विशेषताएं हैं। बुनियादी चरण में बच्चे रंग और लकीरों की दुनिया में मस्त रहते हैं। उनके इस मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए पाठमाला में भरपूर गतिविधियों का समावेश किया गया है। साथ ही उन्हें नवीन शब्दों और छोटे-छोटे सरल वाक्यों से भी परिचित कराया गया है। प्रारंभिक चरण में बच्चे अपने परिवेश के साथ तालमेल बिठाना शुरू करते हैं। लिहाजा पाठ्यपुस्तक को दिलचस्प बनाया गया है। रचनात्मक गतिविधियों पर फोकस करते हुए विषय वैविध्य का भी पूरी तरह से ध्यान रखा गया है।
मध्य चरण में बच्चों की रचनात्मकता, जिज्ञासा और काल्पनिक उड़ान अपने उत्कर्ष पर होती है। ऐसे में तीनों में संतुलन स्थापित करना जरूरी होता है। इसलिए बच्चों को कई गतिविधियों के माध्यम से अभिव्यक्ति के मौके मुहैया किए गए हैं।
बांसुरी हिंदी पाठमाला श्रृंखला में यदि सूरदास, कबीरदास, तुलसीदास, रहीम, मीराबाई, गिरधर कविराय जैसे उत्कृष्ट रचनाकारों को स्थान दिया गया है तो रामधारी सिंह दिनकर, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, हरिवंश राय बच्चन, हृदयेश मयंक, ओम निश्चल, परशुराम शुक्ल, बालस्वरूप राही जैसे समकालीन कवियों की बाल रचनाएं भी संकलित की गई हैं। इसके साथ ही डॉ. जितेंद्र पाण्डेय की कृत्रिम बुद्धिमता (एआई), उर्मिला बाली की आस्था का पर्व महाकुंभ एनसीईआरटी द्वारा निर्देशित डॉ. पूजा अलापुरिया का शौर्य की महागाथा ऑपरेशन सिंदूर, लाल बहादुर चौरसिया ‘लाल’ की नौशेरा का शेर, रोहिणी शशांक मिश्रा का शतरंज का बाल खिलाड़ी डी. गुकेश और हेमलता त्रिपाठी का सबसे कम उम्र का प्रोफेसर सबोर्नो इसाक बारी शीर्षक से बेहद रोचक जीवनी और लेख भी इसमें मिलेंगे।
मेरे लिए गर्व का विषय है कि मेरी (इन पंक्तियों के लेखक राजेश विक्रांत) एक रचना गगनयात्री शुभांशु शुक्ला को भी इसमें स्थान दिया गया है। हरेक पाठमाला में “गुड टच- बैड टच” और “शुगर” के प्रति जागरूकता दर्शायी गई है। इस प्रकार बांसुरी में वर्तमान समय का लेखा जोखा एवं भविष्य की अपार संभावनाओं पर बच्चों के स्तर के अनुकूल बेहद उम्दा सामग्री मौजूद है।
गुस्ताव फ़्लॉबेयर ने लिखा है कि लेखक को अपनी पुस्तक में ब्रह्मांड में ईश्वर की तरह होना चाहिए, जो हर जगह मौजूद है और कहीं भी दिखाई नहीं देता है। इसलिए डॉ. जितेंद्र पाण्डेय ने बांसुरी पाठमाला में पंचपदी (अधीति, बोध, अभ्यास, प्रयोग और प्रसार) का सम्यक निर्वहन किया है; मसलन पाठ-पथ (पंचपदी का पहला चरण अधीति) को मनोरंजक गतिविधियों से सजाया है। विषय प्रवेश से पाठ की पृष्ठभूमि तैयार होती है। वैविध्यता के साथ विभिन्न विधाओं के चयन में भारतीय ज्ञान परंपरा को केंद्र में रखा गया है (पंचपदी का दूसरा चरण बोध)। भाषा और जीवन कौशलों का उन्नयन करते हुए पाठों के अभ्यास (पंचपदी का तीसरा चरण-अभ्यास) को अतिशय आनंददायक बनाया गया है। इसमें नए शब्द, आगत शब्द, मुहावरे आदि को जोड़ा गया है। कौशल विकास, आलोचनात्मक चिंतन एवं रचनात्मक प्रतिफल इन पाठ्यपुस्तकों का मुख्य आकर्षण है। इसमें प्रयोग (पंचपदी का चौथा चरण- प्रयोग) को बल मिला है। इस चरण में कक्षा के बाहर की अनेक गतिविधियों एवं प्रयोगों को बढ़ावा दिया गया है। वैश्विक विस्तार से बच्चे विश्व समुदाय से जुड़ते हैं एवं उनके जिज्ञासु मन को समाधान मिलता है (पंचपदी का पांचवां चरण-प्रसार)।
प्रेम भंडारी ने शायद बांसुरी श्रृंखला की किताबों के बारे में ही लिखा है- छुपी है अन-गिनत चिंगारियां लफ्जों के दामन में, जरा पढ़ना गजल की ये किताब आहिस्ता-आहिस्ता। इसमें हस्तकला, वृक्षारोपण, अभिनय गीत, गायन आदि को मिलाकर चित्र निर्माण चार्ट बनाना डॉक्यूमेंट्री बनाना / देखना ऑडियो / वीडियो रिकॉर्ड करना निरीक्षण मिट्टी से फल / सब्जियां बनाना परियोजना कार्य / रंग भरना संवाद स्थापित करना कहानी श्रवण / कथन रुई से बादल का निर्माण, शब्द पहेली, शैक्षणिक परिभ्रमण, गूगल अर्थ परिभ्रमण, खेल-खेल में सीखना, सांस्कृतिक गतिविधियां, कृत्रिम बु‌द्धिमत्ता आदि को भी जगह दी गई है।
बांसुरी हिंदी पाठमाला में पंचकोशों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय) की अंतःधारा अधिगम प्रक्रिया के समानांतर बहती है। किसी भी वर्तनी संबंधी भ्रम की स्थिति से बचने के लिए पाठ्य पुस्तक के अंतिम पृष्ठों में केंद्रीय हिंदी निदेशालय के अद्यतन दिशा-निर्देशों के अनुरूप ‘हिंदी वर्तनी का मानकीकरण’ एवं एनसीईआरटी द्वारा प्रस्तावित “सीखने के प्रतिफल” भी दिए गए हैं।
बांसुरी हिंदी पाठमाला की गुणवत्ता एवं सहजता इसकी पहचान है, साथ ही इनसे जुड़कर छात्रों में अपने राष्ट्र के प्रति गौरवबोध होगा, उनमें उदार विश्वदृष्टि विकसित होगी और जीव-जगत के लिए संवेदना जागेगी। प्रस्तुत पाठ्यमाला में शिक्षाविदों के अनेक सुझावों को शामिल किया गया है। डॉ. जितेंद्र पाण्डेय और उनकी टीम ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति से संबंधित सभी पहलुओं का गहन शोध किया है। इसे पढ़कर निश्चित रूप से नई पीढ़ी देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाएगी। पाठ्य पुस्तकों का विषय वैविध्य इन्हें एकरसता से उबारकर समरसता के व्यापक फलक पर प्रतिष्ठित करेगा।

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