एम एम एस
बिहार के नतीजे क्या आए लोगों ने राहुल गांधी के भविष्य की पोथी बांचनी शुरू कर दी! उनका भविष्य अंधकार लगने लगा है उन लोगों को! लेकिन हमारे एक मित्र हैं उन्होंने जो लिख छोड़ा वह पढ़ने लायक है।
हर डेढ़ सयाना सबसे ज्यादा राहुल को कोसने में लगा है तो हम भी बहती गंगा में ‘हाथ-मुंह’ धो लेते हैं।
असल में उन्हें चुनाव लड़ने का शऊर ही नहीं हैं चुनाव क्या खाक जीतेंगे। सयानों ने लाख कमियां गिनाई हैं जिन्हें यहां दोहराने की जरूरत नहीं, लेकिन कुछ कमियां हम भी गिना देते हैं।
सबसे पहली बात राहुल को सारे ‘अनैतिक’ तौर तरीके छोड़कर मोदी- शाह की तरह ‘आदर्श’ ‘शुद्ध’, ‘सात्विक’, ‘परम पवित्र’ तरीके से चुनाव लड़ना चाहिए।
ये क्या बात हुई कि आप रोजगार, खुशहाली, विकास आदि की बात करके चुनाव लड़ते हैं…।
अरे भई ये ‘अमृतकाल’ है यहां ये सब नहीं चलेगा…। थोड़ा लुच्चा, लफंगापन, थोड़ी नफरत, थोड़ा झूठ, फरेब, चोरी, डवैâती के बिना वैâसा चुनाव…! हांय…!
अब आइए हम बताते हैं राहुल को क्या-क्या करना चाहिए था…
१) सबसे पहले अपना एक चुनाव आयोग बना कर एसआईआर के जरिए ६५ लाख मतदाताओं के नाम सूची से उड़वा देने थे। फिर आवेदन लेकर १६ लाख मनमाफिक वोटर जुड़ने थे। इसके अलावा पांच लाख वोटर बिना लिखतम-पढ़तम के जोड़ने थे। चुनाव आयोग को खूंटे पर बांध कर रखना था, आदर्श आचार संहिता का आदर्श ‘अचार’ बना कर डिब्बे/भरनी में रख देना था। राहुल को अपना एक ‘सुप्रीम कोर्ट’ भी तो बनाना था जो एसआईआर जैसे मुद्दे पर व्यास पीठ पर बैठ कर प्रवचन देता रहता…। अनिल मसीह को ‘लोकतंत्र का हत्यारा’ कह कर फिर छुट्टा सांड़ की तरह खुला छोड़ देता। (लानत है राहुल इतना सा काम नहीं कर सके।)
२) इसके बाद चुनाव की घोषणा से ऐन पहले महिलाओं के खाते में सीधे दस-दस हजार रुपए जमा करवाने थे। कुल मिलाकर कुछ अरब रुपए ही तो देने थे। कोई शिकायत करता तो अपने खूंटे पर बंधे चुनाव आयोग से कहलवा देते कि ‘ऑन गोइंग स्कीम’ है इसलिए बंद नहीं होगी। (राहुल कुछ अरब रुपए खर्च नहीं कर सके।)
३) राहुल ने पूरे चुनाव में अपने भाषणों में एक बार भी कट्टा, छर्रा, सिक्सर, मुजरा नहीं बोला। अरे चुनाव लड़ रहे थे तो सड़कछाप छिछोरे जैसी भाषा में डायलॉग नहीं मार सकते थे तो चुनाव काहे लड़ने आए? क्या बिगड़ जाता अगर एक बार कह देते कि चचा ट्रंप ने ‘मोदी की कनपटी पर कट्टा’ लगा कर सीजफायर करवाया था। (राहुल ऐसी बोली नहीं बोल सके।)
४) चुनाव शुरू होने से पहले कहीं कोई लफंगा उनकी मां को गाली देता और वे हर मंच से आंसू बहाते कि देखो मेरी मां को गाली दी जा रही है। उनकी पार्टी बिहार बंद करवाती और फिर उसमें गालियां दी जातीं। पार्टी के प्रवक्ता गोदी मीडिया में छाती फाड़ कर चीखते देखो राहुल की मां को मो शा ने गाली दी है। (राहुल इतना सा ड्रामा नहीं कर सके।)
५) मतदान के दिन कर्नाटक और हिमाचल से रेल में भर-भर कर वोट डालने के लिए वोटर भेजने थे। पार्टी के पदाधिकारी/ कार्यकर्ता जो दिल्ली, उत्तर प्रदेश या कहीं भी वोट डाल चुके उनके वोट बिहार में डलवाने थे। ऐसे शूरवीरों के फोटो सोशल मीडिया की शान बनने थे, लेकिन कुछ नहीं हुआ। (राहुल इतना सा खेल नहीं कर सके।)
६) पूरे चुनाव में घुसपैठियों का राग अलापना था। घुसपैठिए, घुसपैठिए कह कर खुल कर ‘हिंदू- मुस्लिम’ करना था। हर सभा में कहना था कि देखो मेरी सरकार है, मेरा गृहमंत्री है फिर भी लाखों घुसपैठिए घुस आए हैं, वोटर बन गए हैं। कहना था कि मैं और मेरी सरकार महा नकारा हैं इसलिए मुझे वोट दो। (राहुल न नफरत पैâला सके और न ही अपनी नाकामी बता सके।)
७) राहुल को अपनी ईडी, सीबीआई, आईटी आदि बना कर विरोधी नेताओं की कमर तोड़ देनी थी। कम से कम किसी दूसरे राज्य में किसी विरोधी प्रत्याशी के घर बुलडोजर भिजवा कर उसे मिट्टी में मिलवा देते। (राहुल इतना सा काम नहीं कर सके।) इन तमाम नैतिक, शुद्ध, सात्विक, परम पवित्र तरीकों से चुनाव लड़ते तो शायद थोड़ा-बहुत जीत जाते लेकिन क्या करें राहुल को चुनाव लड़ने का शऊर ही नहीं है।
लेकिन सुनो राहुल,
हजार चुनाव हारते रहना, लेकिन कभी ‘मो शा’ जैसे मत बन जाना…।
कभी उनके जैसे घटिया भाषण मत देना, कभी उनकी तरह नफरत मत पैâलाना, कभी उनकी तरह झूठ मत बोलना,कभी उनकी तरह वोट चोरी मत करना। जिस दिन चुटकी भर भी उन जैसे बन जाओगे, उस दिन बहुतों की उम्मीदों का दीया बुझ जाएगा। ऐसे ही जलते रहना, ऐसे ही चलते रहना।
ऐसे ही बने रहना,
ऐसे ही तने रहना। इति।
