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बेनकाब हुई महायुति सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था … दवा-प्रतिरोधक टीबी ने राज्य को जकड़ा!

जमीनी स्वास्थ्य सेवा, पोषण और मॉनिटरिंग पूरी तरह चरमराई

धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
महाराष्ट्र में दवा-प्रतिरोधक टीबी की जकड़न ने ऐसा महासंकट खड़ा किया है कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह हिल गई है। हालात ये हैं कि देश के हर चौथे नए टीबी मरीज की जड़ें महाराष्ट्र में मिल रही हैं। इसका खुलासा खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में हुआ है। दूसरी तरफ यह भी बताया गया है कि राज्य में जमीनी स्वास्थ्य सेवा से लेकर पोषण योजनाओं और मरीज मॉनिटरिंग तक पूरी प्रणाली बिखरी पड़ी है। नतीजतन, महायुति सरकार की तथाकथित स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर बेनकाब हो गई है। इसी के साथ ही टीबी २०२५ का नारा अब खोखला लगने लगा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट २०२५ बताती है कि २०२४ में दुनिया के कुल नए टीबी मरीजों में हर चार में से एक हिंदुस्थान से था। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि दवा-प्रतिरोधक टीबी का खतरा लगातार बढ़ रहा है और इसका सबसे बड़ा प्रहार महाराष्ट्र पर हो रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में दवा-प्रतिरोधक टीबी मरीजों की तेजी से बढ़ती संख्या एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुकी है। वर्ष २०१५ में देश में प्रति लाख आबादी पर २३७ टीबी मरीज थे, जो २०२४ में घटकर १८७ पर आए। मृत्यु दर भी २८ से गिरकर २१ पर पहुंची है। डिजिटल एक्स-रे, आण्विक जांच और ‘निक्षय’ जैसी तकनीकी सुधारों के बावजूद टीबी का डेंजर लेवल कम नहीं हुआ है। केंद्र सरकार का ‘टीबी-मुक्त भारत २०२५’ लक्ष्य अब लगभग असंभव दिखने लगा है। डब्ल्यूएचओ के मानकों के अनुसार इस समय तक मरीजों में ५० फीसदी और मौतों में ७५ फीसदी की कमी आवश्यक थी, लेकिन देश सामाजिक असमानता, कुपोषण, शहरी झुग्गियों की स्थिति और बढ़ती दवा-प्रतिरोधक टीबी के चलते उस रफ्तार से नहीं चल पाया।

स्थिति बेहद गंभीर!
राज्य स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, २०२४ में महाराष्ट्र में २.३ लाख नए टीबी मरीज सामने आए। इनमें १०,००० से अधिक मरीज दवा-प्रतिरोधक टीबी के थे, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक हैं। सिर्फ २०२५ के पहले दो महीनों में ही ४०,००० नए मरीज सामने आने से स्वास्थ्य विभाग में अफरातफरी मच गई है।

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