सामना संवाददाता / मुंबई
बिहार में जिन नेताओं की सभाओं में खाली कुर्सियां ज्यादा दिखाई देती हैं, उन्हीं की सरकार बन जाती है। ऐसा तीखा तंज शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) पक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने एनडीए पर कसा। साथ ही उन्होंने कहा कि चुनाव लोकतंत्र की जान है और केंद्र सरकार के दबाव में उसी जान पर हमला किया जा रहा है।
कल ‘मातोश्री’ में ‘आमदार चषक’ के लोगो का अनावरण हुआ। इस मौके पर उद्धव ठाकरे ने बिहार चुनाव को लेकर प्रतिक्रिया दी। पत्रकारों के सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने कहा था कि ‘जो जीता वही सिकंदर’, लेकिन सिकंदर बनने का राज आज तक कोई समझ ही नहीं पाया। जो जीते हैं, उन्हें बधाई। लेकिन मुझे एक बात समझ में नहीं आई कि तेजस्वी यादव की सभाओं में जो भारी भीड़ दिखती थी, क्या वह असल में जनता थी या एआई द्वारा बनाई गई भीड़? अब तो यह भी समझना मुश्किल हो गया है। ऐसा तंज उन्होंने भाजपा पर कसा।
बिहार की जनता रोज त्रासदी से गुजर रही है
रुपए पाने के बाद उनका मन कैसे बदला?
उद्धव ठाकरे का तंज
कल ‘मातोश्री’ में ‘आमदार चषक’ के लोगो का अनावरण हुआ। इस मौके पर शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) पक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने बिहार चुनाव को लेकर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि महिलाओं को १० हजार रुपए देने की घोषणा एक बड़ा पैâक्टर था, लेकिन उससे भी बड़ा पैâक्टर था कि बिहार की जनता रोज जिस त्रासदी से गुजर रही है, ये रुपए पाने के बाद उनका मन वैâसे बदला गया? यह समझना मुश्किल है।
अभी तक मुख्यमंत्री तय नहीं
अभी तक बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा सामने नहीं आया है। यही उनके बहुमत का गणित है। हमारे महाराष्ट्र में भी जबरदस्त बहुमत होने के बावजूद मुख्यमंत्री चुनने में एक महीना लगा था। वही प्रयोग अब बिहार में होने जा रहा है। उद्धव ठाकरे ने सवाल उठाया कि जब आपके पास बहुमत है तो नेता चुनने में इतना समय क्यों लग रहा है?
यह कैसा लोकतंत्र?
हमें चुनावों का विरोध नहीं है। चुनाव लोकतंत्र की जान है। लेकिन अगर उसी जान पर हमला हो, उसकी पारदर्शिता खत्म हो जाए तो उसे लोकतंत्र वैâसे कहा जा सकता है? लोकतंत्र का यह वैâसा गणित है कि जिनकी सभाओं में बंपर भीड़ होती है, उनकी सरकार नहीं बनती और जिनकी सभाओं में खाली कुर्सियों की संख्या बहुत ज्यादा होती है, उन्हीं की सरकार बन जाती है! इसका अर्थ समझ पाना मुश्किल है।
चुनाव आयोग कुछ बोलने को तैयार नहीं
यह समझ में न आनेवाला गणित है। मतदाता सूची से ६५ लाख नाम हटाए गए थे। वे नाम वापस जोड़े गए थे या नहीं, कुछ पता नहीं। महाराष्ट्र में भी सभी दलों ने मोर्चा निकाला था कि डुप्लीकेट वोटरों का पंजीकरण हुआ है। कई जगह फर्जी पते दिए गए, लेकिन चुनाव आयोग न तो कुछ बोलने को तैयार है और न कुछ करने को। चुनाव आयोग पूरी तरह निष्क्रिय बैठा है। क्या यही लोकतंत्र है?
