जो पूछा शाम से
खामोशियों का राज मैंने
मुस्कुराई वो मगर
ना कह के कुछ सब कह गयी।
लूट ली सबने मिलके
एक भरी महफिल को
बाद सुबह तो खाली
कुर्सी ही रह गयी।
कितना खुशहाल परिंदे
का आशियाना था
बस एक कलम क्या चली
वो अगली सुबह ढह गयी।
अजीब हाल है, माझी सा
क्यों तेरा पूरन
कश्ती उम्मीद की
दरिया में वो जो बह गयी।
-पूरन ठाकुर जबलपुरी
कल्याण-ईस्ट
