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मुंबई डायबिटीज केयर फाउंडेशन ने मोटापा और डायबिटीज पर जागरूकता बढ़ाने के लिए आयोजित किया विशेष कार्यक्रम

सामना संवाददाता / मुंबई

मुंबई डायबिटीज केयर फाउंडेशन ने डायबिटीज और मोटापे के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय “मोटापे और डायबिटीज से लड़ने की दिशा में एक कदम” (Step Towards Fighting Obesity and Diabetes) था, जो निवारक देखभाल और जीवनशैली में बदलाव की तत्काल आवश्यकता पर जोर देता है। इस अवसर पर प्रमुख डॉक्टरों ने मिलकर मेटाबोलिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और मरीजों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से 14 प्रतिज्ञाएं लीं।
भारत में डायबिटीज से प्रभावित आबादी सबसे बड़ी है। 10 करोड़ से अधिक लोग इस बीमारी के साथ जी रहे हैं और लगभग 13.6 करोड़ लोगों को प्री-डायबिटीज का खतरा है। विश्व स्तर पर 2024 में 58.9 करोड़ वयस्क (20-79 वर्ष) डायबिटीज से पीड़ित थे, जो कि दुनिया की वयस्क आबादी का 11.1% है। अनुमान है कि 2050 तक, यह संख्या बढ़कर 85.3 करोड़ (13%) हो जाएगी, जो वैश्विक स्तर पर 45% की वृद्धि दर्शाती है।
डायबिटीज का एक प्रमुख कारण मोटापा है। गतिहीन जीवनशैली और खराब खान-पान के कारण खतरनाक दर से बढ़ रहा है। यह दोहरी महामारी जन स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करती है। अमदाबाद के Diacare- Diabetes Care and Hormone Clinic के अध्यक्ष और मुख्य मधुमेह विशेषज्ञ डॉ. बंशी साबू ने सूचित किया है कि इसी वजह से स्वास्थ्य पेशेवरों को रोकथाम, जल्द से जल्द जांच और समग्र देखभाल का महत्त्व सभी तक पहुंचाने का नेतृत्व करना आवश्यक है।
इस पहल के तहत डॉक्टरों ने 14 प्रतिज्ञाएं लीं, जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं, मोटापे को एक पुरानी बीमारी के रूप में मानना, शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देना, लीवर और मुंह के स्वास्थ्य में सुधार करना, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना और भारत को मेटाबोलिक उत्कृष्टता में एक वैश्विक नेता बनाना।
लीना डायबिटीज केयर एंड मुंबई डायबिटीज रिसर्च सेंटर के निदेशक और सलाहकार डायबेटोलॉजिस्ट, डॉ. मनोज चावला ने कहा कि डायबिटीज और मोटापा अलग स्थितियां नहीं हैं, बल्कि वे आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और गंभीर चयापचय बीमारी को बढ़ाने में उनका हाथ होता है। इन स्थितियों के कारण गंभीर मधुमेह-संबंधी जटिलताओं का खतरा बढ़ जाता है, जिसमें हृदय रोग का तेजी से बढ़ना, नेफ्रोपैथी (गुर्दे की बीमारी) और फैटी लीवर रोग शामिल हैं।
लीना डायबिटीज केयर सेंटर की सलाहकार डायबेटोलॉजिस्ट, डॉ. पूर्वी चावला ने कहा कि दशकों से ऐसी स्थिति थी कि मोटापा और डायबिटीज से जूझ रहे व्यक्तियों के पास वजन घटाने के विकल्प जैसे कि आहार, व्यायाम और सर्जरी आदि बहुत ही सीमित थे। आज इसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। फार्माकोथेरेपी, जैसे कि सेमाग्लूटाइड (Semaglutide), के उपयोग पर क्लिनिकल सहमति बढ़ रही है। डायबिटीज से पीड़ित कई लोगों को वजन घटाने और उसे बनाए रखने में काफी कठिनाई होती है, इस बात को मद्देनजर रखते हुए यह विकास बहुत महत्वपूर्ण है।
आरएसएसडीआई (Research Society for the Study of Diabetes in India) के निवर्तमान महासचिव, डॉ. राकेश पारेख ने एक महत्वपूर्ण बात पर जोर देते हुए कहा कि जबकि जीवनशैली में बदलाव डायबिटीज की रोकथाम और मोटापे के प्रबंधन की नींव है। हम, डॉक्टर होने के नाते, भारतीय आबादी के लिए विशेष रूप से तैयार एक बहु-आयामी दृष्टिकोण विकसित करने के लिए एक साथ आए हैं। यह रणनीति अनूठी चयापचय चुनौतियों जैसे कि नॉन-अल्कोहलिक फैटी लीवर बीमारी-का समाधान करने के लिए आवश्यक है, जो अक्सर प्रचलित ‘थिन-फैट फेनोटाइप’ (thin-fat phenotype, यानी दुबले-पतले दिखने के बावजूद शरीर में वसा की अधिकता) से उत्पन्न होती हैं।”
यह आयोजन मोटापे और डायबिटीज से लड़ने के लिए मेडिकल समुदाय को एकजुट करने में एक महत्वपूर्ण कदम है। ये प्रतिज्ञाएं लेकर, डॉक्टर एक प्रभावशाली उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं और इस संदेश को सुदृढ़ कर रहे हैं कि रोकथाम और शिक्षा ही स्वस्थ भविष्य की कुंजी हैं। मुंबई डायबिटीज केयर फाउंडेशन का लक्ष्य भारत को मेटाबोलिक उत्कृष्टता में वैश्विक स्तर पर आशा का प्रतीक बनाना है और यह पहल उस दृष्टिकोण की दिशा में एक कदम है।

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