मुख्यपृष्ठस्तंभपॉलिटिका : पराली खत्म, फिर क्या है, जहरीली हवा की असली वजह?

पॉलिटिका : पराली खत्म, फिर क्या है, जहरीली हवा की असली वजह?

के.पी. मलिक
दिल्ली की हवा एक बार फिर जानलेवा स्तर पर है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) लगातार ४०० के पार बना हुआ है। अस्पतालों में सांस, अस्थमा और हृदय रोग के मरीज बढ़ रहे हैं। बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। हर साल की तरह इस बार भी पहला आरोप किसानों पर ही लगाया गया। कहा गया कि पराली जलाने से दिल्ली का दम घुट रहा है। लेकिन अब सवाल यह है कि जब खेतों में पराली नहीं जलाई जा रही, तब यह जहर आ कहां से रहा है? धान की कटाई खत्म हो चुकी है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी में गेहूं और सरसों की फसलें खड़ी हैं। उपग्रह आधारित निगरानी प्रणालियों के अनुसार, इस अवधि में पराली जलाने की घटनाएं न के बराबर हैं या पिछले वर्षों की तुलना में बेहद कम रहीं हैं। इसके बावजूद दिल्ली की हवा ‘गंभीर’ श्रेणी में बनी हुई है? यह साफ संकेत है कि समस्या की जड़ कहीं और है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और विभिन्न सरकारी अध्ययनों में बार-बार यह सामने आया है कि दिल्ली के प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान शहर के भीतर के स्रोतों का है। एक अनुमान के मुताबिक, करीब ५५-६० फीसदी प्रदूषण वाहनों और करीब २०-३० फीसदी भवन निर्माण के अंधाधुंध हो रहे कार्यों की धूल से आता है। बाकी हिस्सा उद्योग, डीजल इंजनों, जेनरेटर, कचरा जलाने और अन्य स्थानीय स्रोतों से आता है। इस सब के बावजूद नीति और बयानबाजी का सबसे आसान निशाना किसान ही बनते हैं। क्योंकि किसान के पास न तो कोई बड़ा मीडिया नेटवर्क है, न प्रभावशाली कोई लॉबी और न ही अदालतों तक रोज की पहुंचने की ताकत। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में डीजल और पेट्रोल वाहनों की भरमार है, ट्रैफिक बेकाबू है, सरकार द्वारा सार्वजनिक परिवहन जरूरत के मुताबिक नहीं बढ़ाया गया है। इमारतें और भवन निर्माण का कार्य साल भर बिना पर्याप्त धूल नियंत्रण के चलते रहते हैं। ग्रैप जैसे आपातकालीन उपाय लागू तो जरूर होते हैं, लेकिन ये अक्सर कागजों तक सीमित रहते हैं। नियम तो हैं, लेकिन पालन कराने की इच्छाशक्ति कहीं नहीं दिखती। क्योंकि भ्रष्टाचार और ऊंची पहुंच का चारों ओर बोलबाला है।
दरअसल, सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हालात इतने गंभीर होने के बावजूद सत्ता के शीर्ष स्तर से कोई ठोस और स्पष्ट हस्तक्षेप नजर नहीं आता। राष्ट्रपति भवन से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक खामोशी छायी हुई है। न्यायपालिका, जिसे स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार प्राप्त है, उसकी सक्रियता भी सवालों के घेरे में है। जब दिल्ली के दो करोड़ से ज्यादा लोग जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हों, तब यह चुप्पी खुद एक गंभीर सवाल बन जाती है। विडंबना यह है कि अगर कोई आम नागरिक या युवा इस मुद्दे पर सड़क पर आवाज उठाए, तो उसे व्यवस्था का उल्लंघन बताकर हटा दिया जाता है। लेकिन जिस हवा में सांस लेना मुश्किल हो चुका है, उस पर जवाबदेही तय करने वाला कोई नहीं।
बहरहाल नई दिल्ली की खराब और जहरीली हवा पूरी दुनिया देख चुकी है। हाल ही में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अंदाज में कई बार खांसते हुए वीडियो में देखा गया था। अन्य विदेशी मेहमानों की यात्राओं के दौरान भी यह तस्वीरें वैश्विक मंच पर भारत की छवि पर सवाल उठाती रही हैं। इसके बावजूद नीति-निर्माण में प्राथमिकता बदलती नहीं दिखती और दिल्ली और केंद्र की सरकार आंखें बंद कर कुंभकर्णी नींद सो रही है। अन्यथा अगर सरकार चाहे तो इस गंभीर समस्या का समाधान निकाला जा सकता है। क्योंकि इसका समाधान कोई रहस्य नहीं है बल्कि जरूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति की। अगर सरकार मजबूत इच्छाशक्ति और ईमानदारी से सार्वजनिक परिवहन को तेजी से और ईमानदारी से बढ़ाए तो निजी वाहनों की संख्या को तेजी से कम किया जा सकता है। दिवाली के दौरान गंभीर प्रदूषण की समस्या के समय इमारतों और अन्य भवन निर्माण कार्यों पर सख्ती से रोक लगाने की जरूरत है। पुराने और अत्यधिक प्रदूषण पैâलाने वाले डीजल वाहनों पर वास्तविक प्रतिबंध हो। ग्रैप के प्रावधानों को सिर्फ कागजों की फाइलों तक सीमित न करते हुए जमीन पर लागू किया जाए और सबसे अहम, देश के अन्नदाता किसानों को हर बार बलि का बकरा बनाने की राजनीति बंद करके जनहित में इस महत्वपूर्ण समस्या का समाधान निकालने का कठोर कदम उठाया जाए। क्योंकि दिल्ली की हवा पंजाब और हरियाणा के खेतों से नहीं बल्कि दिल्ली शहर की अपनी अव्यवस्थाओं से जहरीली हो रही है। अब सवाल साफ है कि क्या सरकार सच का सामना करेगी, या फिर जिम्मेदारी से बचने के लिए किसान को ही दोष देकर कटघरे में खड़ा करती रहेगी?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, आलोचक ग्रामीण मामलों के जानकार हैं)

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