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संपादकीय : विधान भवन में हिंसक जानवर… भेड़िए कहीं के!

हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब ठाकरे के विचारों के हम ही असली वारिसदार वगैरे होने का ढोंग ‘मिंधे’ सेना के लोग करते रहते हैं। बालासाहेब ठाकरे हिंदुत्ववाद के सेनापति थे ही, फिर भी मानवता धर्म सभी धर्मों से ऊपर है, ऐसा वे कहते थे। इसी मानवता धर्म का गला घोंटने का काम ‘मिंधे’ सेना के लोग कर रहे हैं। मिंधे पार्टी के बुलढाणा के विधायक संजय गायकवाड ने महाराष्ट्र के सूखे, उसमें झुलसे किसान और आत्महत्या करने वाले किसानों का क्रूर मजाक उड़ाया है। उनके द्वारा दिए गए बयान महाराष्ट्र की मानवीय संस्कृति को कलंकित करने वाले हैं। मिंधे के प्यादे विधायक संजय गायकवाड ने बेहद निर्ममता से कहा, ‘आत्महत्या करने वाले किसानों के अंतिम संस्कार में कोई न जाए। उनके शवों को जानवर नोचें, तभी उन्हें सबक मिलेगा और आत्महत्याएं रुकेंगी।’ विधायक गायकवाड ने ऐसा अमानवीय शोध पेश कर भारत के किसानों को कौन-सा ‘चैतन्य’ मंत्र दिया? इस शोध के लिए मुख्यमंत्री फडणवीस ऐसे लोगों को ‘कृषिभूषण’ पुरस्कार देते हैं या प्रधानमंत्री मोदी उन्हें ‘पद्म’ पुरस्कार से सम्मानित करते हैं, बस यही अब देखना बाकी है। गायकवाड का यह बयान सूखे से त्रस्त किसानों के दर्द पर नमक छिड़कने वाला, आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों का मजाक उड़ाने वाला है। किसानों के शवों को जानवर खाएं ऐसी इच्छा व्यक्त करनेवाला विधायक
नराधम प्रवृत्ति का ही
हो सकता है। गायकवाड ने अपनी पार्टी का विकृत चरित्र ही लोगों के सामने ला दिया है। ठाणे में पूर्णेकर के हत्यारों को मदद दी जा रही है और बुलढाणा में गायकवाड जैसे विधायक किसानों की लाशें जानवरों को खिला रहे हैं। फिर भी यही लोग ‘हम ही असली शिवसेना, बालासाहेब ठाकरे के वारिसदार’ होने का ढिंढोरा पीटते फिर रहे हैं। महाराष्ट्र में भीषण सूखा है। फसलों की राख हो गई है। कर्ज के बोझ से किसान बेहाल है। सरकार की मदद यानी घोषणाओं के बुलबुले हैं। वे बुलबुले भी किसानों तक नहीं पहुंचते। इसलिए किसान आत्महत्या कर रहे हैं। महाराष्ट्र में रोजाना आठ से दस किसान आत्महत्या कर रहे हैं। पिछले तीन वर्षों में हजारों किसानों ने आत्महत्या की। महायुति कहलाने वाली सरकार की यह असफलता है। इस संकट को मात देना और उसके लिए जरूरी इच्छाशक्ति फडणवीस सरकार के पास दिखाई नहीं देती। इसके विपरीत सत्ताधारी विधायक सूखाग्रस्त किसानों को ही दोषी ठहरा रहे हैं। ‘उनकी लाशें जानवरों को खाने दो,’ ऐसा शैतानी उपदेश देकर सरकार की संवेदनाएं मर चुकी हैं, यह साबित कर रहे हैं। मवेशियों के चारे-पानी का सवाल गंभीर होता जा रहा है, लेकिन हिंसक जानवरों को किसानों की लाशें खिलाओ, यह कहकर मिंधे गुट के विधायक जंगली जानवरों के पेट-पानी की व्यवस्था कर रहे हैं। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि मिंधे ने विधायक, सांसद नहीं पाले हैं बल्कि ‘भेड़िए’ पाले हैं। इसलिए वे खुद भी
नोच रहे हैं
तथा ‘किसानों को नोचो’ ऐसा जंगली जानवरों को निर्देश दे रहे हैं। इससे पहले भी विधायक गायकवाड ने अपनी हिंसक प्रवृत्ति के कारनामे कई अवसरों पर दिखाए हैं। ‘दाल’ ठंडी है इसलिए विधायक निवास में दंगा करनेवाले यही महाशय थे। संजय गायकवाड वगैरे विधायकों की भाषा यानी ५०-५० करोड़ का नशा और अहंकार है। बालासाहेब ठाकरे के विचारों और राजनीति का केंद्रबिंदु आम मेहनतकश इंसान था। वह मुंबई का मजदूर था और खेतों में पसीना बहाने वाला किसान था। इन मेहनतकशों को स्वाभिमान के साथ जीने का हक मिले और मरने के बाद भी मेहनतकशों का सम्मान बना रहे, यह शिवसेनाप्रमुख की भूमिका थी। आज किसान जीते-जी और मरने के बाद भी अपमान सह रहा है और अब तो मरने के बाद उनकी लाशें भेड़िए खाएं, ऐसी इच्छा संजय गायकवाड जैसे मिंधे के विधायक ने व्यक्त की है। यह उपदेश क्रूर है। एक तरफ हम ही किसानों के ‘मददगार’ हैं, यह दिखाने के लिए सूखे इलाकों में खाद्यान्न के ट्रक भेजकर ‘फोटोबाजी’ करते हैं और उसी समय किसानों को नोचने की भाषा बोलते हैं। विधायक गायकवाड को या तो पद्मभूषण पुरस्कार दो, कृषिभूषण दो, नहीं तो फिर हम किसानों का सम्मान करते हैं, यह साबित करने के लिए इस भेड़िए को ही विधान भवन के बाहर लतियाओ। किसानों को नोचने की भाषा क्या फडणवीस को मंजूर है?

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