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यूपी की पॉलिटिक्स : कुर्सी योगी की हो या पर्ची वाले मोहन की कसौटी दिल्ली के आगे रीढ़ सीधी रखने की है!

-तारीक अनवर
कसौटी दिल्ली के आगे रीढ़ सीधी रखने की है!

सियासत में फैसले सिर्फ फैसले नहीं होते, वे नेताओं की हैसियत, हुकूमत की असलियत और सत्ता के भीतर ताकत के बंटवारे की कहानी भी कहते हैं। एक ही पार्टी के दो मुख्यमंत्री हों, एक उत्तर प्रदेश का और दूसरा मध्य प्रदेश का, तो उनके फैसलों में फर्क दिखाई दे, यह अपने आप में खबर है। लेकिन जब इस फर्क के पीछे दिल्ली की मर्जी, संघ की पसंद और राज्य की सियासी मजबूरियों का सवाल खड़ा हो, तब खबर महज खबर नहीं रहती, वह सत्ता के चरित्र को समझने का आईना बन जाती है। उत्तर प्रदेश में राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों के चयन को लेकर योगी आदित्यनाथ की भूमिका की चर्चा इसी संदर्भ में की जा रही है। दावा यह है कि उन्होंने मौजूदा सांसदों को दोबारा मौका देने के बजाय नए चेहरों को आगे बढ़ाया और जातीय तथा क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता दी। तीन ओबीसी, दो दलित, दो ब्राह्मण और एक ठाकुर को प्रतिनिधित्व देने की यह कवायद महज आठ नामों की अदला-बदली नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव के लिए सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती है। यहां सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसे राज्यसभा भेजा गया और किसे नहीं। बड़ा सवाल यह है कि मुख्यमंत्री अपने राज्य की राजनीतिक जरूरतों को कितना महत्व दे सकता है और केंद्रीय नेतृत्व के फैसलों के सामने उसकी स्वतंत्रता की सीमा कहां तक है?
योगी बनाम पर्ची वाले मोहन: फर्क आखिर है कहां?
राजनीति में किसी नेता की ताकत का अंदाजा उसके भाषणों से कम और उसके फैसलों से ज्यादा लगाया जाता है। ठाकुर आदित्यनाथ योगी को लेकर यह धारणा बनाई जा रही है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को महत्व दिया और संगठन तथा सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों का चयन किया। दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के पर्ची वाले मुख्यमंत्री मोहन यादव के सामने केंद्रीय नेतृत्व की पसंद को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। दुनिया के सबसे बड़े दरिंदे एपस्टीन के साथ संबंधों को लेकर घिरे हरदीप सिंह पुरी को राज्यसभा में लाने की कवायद के संदर्भ में केंद्रीय मंत्री एल. मुरुगन की सीट खाली होने और उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर जो चर्चा है, वह कई सवाल पैदा करती है। अगर किसी नेता को संसद में बनाए रखने के लिए दूसरे नेता को अपनी जगह छोड़नी पड़े, तो लोकतंत्र में यह पूछना स्वाभाविक है कि आखिर इस पूरी कवायद की जरूरत क्या थी? या मजबूरी क्या है कहीं एपस्टीन के साथ संबंध ही मजबूरी है? दिल्ली की पसंद और राज्यों की मजबूरी भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ‘मोशा’ की जोड़ी को निर्णायक माना जाता है और उनके निर्णय को कोई चैलेंज नही कर सकता या हिम्मत नही रखता? संगठन से लेकर सरकार तक, उम्मीदवारों के चयन से लेकर राजनीतिक नियुक्तियों तक, केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका पर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में अगर दरिंदे एपस्टीन के संबंधों के चलते हरदीप सिंह पुरी को दोबारा राज्यसभा में लाने के लिए मध्य प्रदेश की सीट का इस्तेमाल किया गया, तो सवाल उठेंगे ही कि क्या पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया कुछ चुनिंदा लोगों की पसंद तक सिमटती जा रही है। राजनीतिक व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात से बनती है कि निर्णयों के पीछे कोई ठोस तर्क हो और पार्टी के भीतर विभिन्न स्तरों पर संवाद की गुंजाइश बनी रहे।
यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका का सवाल भी महत्वपूर्ण है। भाजपा की राजनीति में संघ को वैचारिक और संगठनात्मक आधार माना जाता है या था। अगर संघ के कुछ नेताओं की पसंद अलग हो और केंद्रीय नेतृत्व का फैसला कुछ और, तो यह स्वाभाविक है कि राजनीतिक पर्यवेक्षक इस अंतर को समझने की कोशिश करेंगे।
जातीय संतुलन या सत्ता का संतुलन?
उत्तर प्रदेश में जातीय समीकरणों की अहमियत किसी से छिपी नहीं है। विधानसभा चुनाव नजदीक हों तो हर पार्टी पिछड़ों, दलितों, ब्राह्मणों, ठाकुरों और दूसरे सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार मजबूत करने की कोशिश करती है। ऐसे में राज्यसभा के उम्मीदवारों का चयन भी आगामी चुनाव की रणनीति का हिस्सा बन सकता है।
लेकिन जातीय प्रतिनिधित्व का सवाल केवल उम्मीदवारों की सूची में अलग-अलग समुदायों के नाम गिन देने से हल नहीं होता। असली सवाल यह है कि इन समुदायों की राजनीतिक हिस्सेदारी कितनी है, उनके मुद्दों को कितना महत्व मिलता है और सत्ता के फैसलों में उनकी आवाज कितनी सुनी जाती है। सवाल यह है कि क्या प्रदेश की राजनीतिक जरूरतें केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताओं के साथ बराबरी से रखी जा सकती हैं? क्या पर्ची वाला मुख्यमंत्री अपनी असहमति दर्ज करा सकता है? क्या किसी राज्य की राजनीतिक हैसियत केवल इतनी रह गई है कि वह दिल्ली के फैसलों के लिए रास्ता उपलब्ध कराए? मुख्यमंत्री की कुर्सी और राजनीतिक स्वाभिमान
मुख्यमंत्री का पद केवल सरकारी गाड़ी, बंगले और सुरक्षा का नाम नहीं है। मुख्यमंत्री से अपेक्षा होती है कि वह अपने प्रदेश के हितों की पैरवी करे, चाहे मामला आर्थिक संसाधनों का हो, सामाजिक प्रतिनिधित्व का हो या राजनीतिक नियुक्तियों का। अगर कोई मुख्यमंत्री केंद्रीय नेतृत्व के हर फैसले को बिना सवाल स्वीकार करता है, तो उसकी संगठनात्मक निष्ठा पर भले कोई प्रश्न न उठे, लेकिन उसकी स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका पर बहस जरूर होगी। ठाकुर आदित्यनाथ योगी और कृपापात्र पर्ची वाले बेचारे मोहन यादव की तुलना केवल ठाकुर और पिछड़ा होने के आधार पर करना भी पर्याप्त नहीं है। राज्यसभा की प्रतिष्ठा किससे बढ़ेगी?
राज्यसभा को संसद का उच्च सदन कहा जाता है। इसकी प्रतिष्ठा केवल इस बात से नहीं बढ़ती कि उसमें कौन-सा नेता पहुंचा, बल्कि इससे बढ़ती है कि वहां पहुंचने वाला व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में कितनी गंभीरता से अपनी जिम्मेदारी निभाता है। सदन में बहस, कानूनों की समीक्षा, सरकार से सवाल और जनता के हितों की रक्षा यही उसकी असली पहचान है। अगर नियुक्तियों और उम्मीदवारों के चयन में राजनीतिक सुविधा को सार्वजनिक जवाबदेही से ऊपर रखा जाएगा, तो राज्यसभा की गरिमा पर सवाल उठेंगे। लेकिन अगर चुने गए प्रतिनिधि संसद में अपनी भूमिका ईमानदारी से निभाते हैं, तो उनका चयन भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाएगा। असली सवाल यह है कि फैसले किसके हित में हुए जनता के, प्रदेश के, संगठन के या सत्ता के शीर्ष पर बैठे कुछ लोगों के?
सत्ता के गलियारों में कालीन बिछाने से राजनीतिक कद कितना ऊंचा होता है, यह वक्त तय करेगा। मगर इतना तय है कि लोकतंत्र में किसी भी मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी ताकत दिल्ली की कृपा नहीं, बल्कि अपने प्रदेश की जनता का विश्वास होना चाहिए और राज्यसभा की सबसे बड़ी प्रतिष्ठा किसी खास नेता की मौजूदगी नहीं, बल्कि उसकी स्वतंत्रता, गरिमा और जवाबदेही है।

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