सुनील ओसवाल
जल-संकट क्षेत्र में सिंचाई विभाग इंतजार घर बना। मूवमेंट रजिस्टर गायब। आचार संहिता में भी मंत्री-दफ्तरों के चक्कर पालखेड सिंचाई विभाग का कार्यकारी अभियंता कार्यालय कागजों में सरकारी दफ्तर है, जमीन पर वह अब एक स्थायी इंतजारघर बन चुका है। यहां हर रोज किसान आते हैं, ग्रामीण आते हैं, पानी की समस्या लेकर लोग आते हैं और शाम तक खाली हाथ लौट जाते हैं।
क्योंकि इस दफ्तर में सब कुछ है-कुर्सियां हैं, फाइलें हैं, कर्मचारी हैं बस साहब नहीं हैं। कार्यकारी अभियंता वैभव भागवत कार्यालयीन समय में भी अक्सर नदारद रहते हैं। और जब कभी दिखाई देते हैं तो आम नागरिकों के लिए नहीं। ठेकेदार, पहचान वाले और खास मुलाकातें इन्हीं के बीच उनका ़ज्यादातर समय निकल जाता है। उधर नहर, पंपिंग, जलापूर्ति और सिंचाई की समस्याएं लेकर आए किसान घंटों बैठकर सिर्फ एक ही जवाब सुनते रहते हैं साहब मीटिंग में हैं। इस दफ्तर की सबसे गंभीर और चौंकाने वाली बात है मूवमेंट रजिस्टर का ही गायब होना। सरकारी प्रणाली में यह रजिस्टर अधिकारी की उपस्थिति और आवाजाही का आधिकारिक रिकॉर्ड होता है। लेकिन यहां ऐसा कोई दस्तावेज मौजूद ही नहीं। मतलब साहब कब आए, कब गए, कितनी देर रुके, इसका कोई प्रमाण नहीं। सवाल साफ है। इतनी बड़ी ढील किसके आदेश से और किसके संरक्षण में? जब साहब दफ्तर में नहीं होते तो जवाब पहले से तय मिलते हैं साहब न्न्ण् में हैं। साहब मुंबई मीटिंग में हैं। साहब मंत्री गिरीश महाजन के कार्यालय में बैठक है और यह सब उस वक्त भी कहा जा रहा है, जब राज्य में आदर्श आचार संहिता लागू है। तब सवाल और तीखा हो जाता है। जब सरकारी अधिकारियों की गतिविधियों पर नियंत्रण होना चाहिए, तब एक कार्यकारी अभियंता का लगातार मंत्रियों के दफ्तरों में बैठकों के नाम पर गायब रहना किस नियम के तहत हो रहा है, क्या सरकार के पास इसका कोई लिखित आदेश है, कोई अनुमति कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड, यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की गैरहाजिरी का नहीं है। यह सीधा सवाल है प्रशासन की रीढ़ पर।
दफ्तर कौन चला रहा है?..क्या सिंचाई विभाग किसानों के लिए है या रसूखदारों के लिए?
क्या सरकार को पालखेड की प्यास दिखाई नहीं देती? या फिर यह सब जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है। पालखेड जैसे जल-संकटग्रस्त क्षेत्र में पाटबंधारे विभाग किसानों के लिए जीवनरेखा होना चाहिए, लेकिन यहां जीवनरेखा खुद जवाबदेही के अभाव में सूखती नजर आ रही है। दफ्तर खुला है, लेकिन व्यवस्था पर ताला है और उस ताले की चाबी किसके हाथ में है, अब यह सवाल सिर्फ पालखेड नहीं, सीधे सरकार से है।
