सामना संवाददाता / मुंबई
भारत में ऑनलाइन दवाओं की अवैध बिक्री को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बेंगलुरु स्थित ऑनलाइन फार्मेसी ‘प्लैटिनम आरएक्स अफोलाइफ रिटेल प्राइवेट लिमिटेड’ अब ड्रग नियामक एजेंसियों के रडार पर है, ग्रेटर मुंबई और दिल्ली के ड्रग कंट्रोल विभागों ने इसके खिलाफ शिकायतें आगे बढ़ाते हुए ड्रग कंट्रोलर, कर्नाटक से कार्रवाई की मांग की है।
यह कार्रवाई उस समय सामने आई है जब यह आरोप लगे हैं कि प्लेटिनम आरएक्स ने प्रिस्क्रिप्शन के बिना स्केडयूल एच और एच१ श्रेणी की दवाएं ऑनलाइन माध्यम से बेचकर अंतरराज्यीय रूप से मुंबई और दिल्ली तक आपूर्ति की।
सरकारी पत्राचार से उजागर हुई गंभीरता
१६ दिसंबर २०२५ को संयुक्त आयुक्त (ड्रग्स), एफडीए ग्रेटर मुंबई ने आधिकारिक रूप से ड्रग कंट्रोलर, कर्नाटक को पत्र लिखकर ०६ नवंबर २०२५ की शिकायत अग्रेषित की। पत्र में स्पष्ट किया गया कि प्लेटिनम आरएक्स महाराष्ट्र में लाइसेंस के बिना दवाएं सप्लाई कर रहा है, जबकि कंपनी का पंजीकरण कर्नाटक में है। इसी प्रकार, ०६ जनवरी २०२५ को दिल्ली सरकार के ड्रग कंट्रोल विभाग प्रमुख ने भी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया और ड्रग कंट्रोलर, कर्नाटक को शिकायत भेजते हुए ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत उचित कार्रवाई की मांग की।
प्रिस्क्रिप्शन के बिना खतरनाक दवाएं
शिकायतों के अनुसार, प्लेटिनम आरएक्स ने एंटीबायोटिक्स, कफ सिरप और अन्य प्रिस्क्रिप्शन दवाएं बिना किसी पंजीकृत चिकित्सक की पर्ची के सप्लाई कीं। यह ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स रूल्स, १९४५ के नियम ६५ का सीधा उल्लंघन है। सबसे गंभीर तथ्य यह है कि कुछ दवाएं वरिष्ठ ड्रग अधिकारियों के नाम पर ऑर्डर किए जाने के बावजूद बिना किसी सत्यापन के भेज दी गईं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि कंपनी ने न तो पर्ची जांची और न ही फार्मासिस्ट निगरानी रखी।
हाई कोर्ट के आदेशों की अवहेलना
दिल्ली और मद्रास हाई कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि बिना वैधानिक ढांचे और सुरक्षा उपायों के ऑनलाइन दवा बिक्री पर रोक है। इसके बावजूद ऐसी कंपनियों का खुलेआम संचालन प्रवर्तन तंत्र की कमजोरी को उजागर करता है।
जनहित याचिका से खुलासा
यह मामला डॉ. वेदप्रकाश तिवारी, अधिवक्ता, उच्च न्यायालय द्वारा दायर जनहित याचिका के बाद सामने आया, जिसमें बिल, डिलीवरी सबूत और दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत किए गए। इसके बाद ही मुंबई और दिल्ली की एजेंसियों को हस्तक्षेप करना पड़ा।
अब पूरा मामला ड्रग कंट्रोलर, कर्नाटक के पाले में है। यह केवल एक कंपनी की जांच नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि भारत में प्रिस्क्रिप्शन दवाओं का कानून वास्तव में लागू होता है या नहीं।
