मुख्यपृष्ठस्तंभनिवेश गुरु : देश नेताओं से शक्तिशाली बनता है या निवेशकों से?

निवेश गुरु : देश नेताओं से शक्तिशाली बनता है या निवेशकों से?

भरतकुमार सोलंकी
मुंबई

सोशल मीडिया पर वेनेजुएला को लेकर जो संदेश वायरल हो रहा है, उसमें एक ही पहलू बार-बार उछाला जा रहा है कि अमेरिका ने वेनेजुएला के साथ अन्याय किया। इसमें संदेह नहीं कि अमेरिका की भूमिका सवालों के घेरे में रही है, लेकिन क्या किसी देश के पतन की पूरी जिम्मेदारी किसी बाहरी शक्ति पर डाल देना बौद्धिक ईमानदारी है? क्या यह जरूरी नहीं कि हम यह भी समझें कि वेनेजुएला अंदर से क्यों खोखला हुआ?
कभी लैटिन अमेरिका का सबसे समृद्ध देश रहा वेनेजुएला – तेल संपदा, पर्यटन, सौंदर्य प्रतियोगिताओं और ऊंची जीडीपी के लिए जाना जाता था। फिर सवाल यह है कि ऐसा क्या हुआ कि वही देश आज अपने ८० प्रतिशत नागरिकों को शरणार्थी बना चुका है? क्या यह सिर्फ अमेरिका की वजह से हुआ या उस देश की आर्थिक नीतियों, सब्सिडी आधारित लोकलुभावन राजनीति और उद्योग-विरोधी सोच ने उसे भीतर से तोड़ दिया? यहां एक बड़ा सवाल उठता है – क्या देश को मजबूत बनाते हैं नेता या देश को मजबूत बनाती है उसकी अर्थव्यवस्था? और उससे भी ज्यादा अहम सवाल – क्या देश की अर्थव्यवस्था लोगों की अर्थव्यवस्था से अलग हो सकती है? अगर देश के नागरिक आर्थिक रूप से कमजोर होंगे, निवेशक नहीं बनेंगे, पूंजी निर्माण नहीं करेंगे, तो क्या केवल नारों और भावनाओं से कोई देश ताकतवर बन सकता है? यही संदर्भ भारत पर लागू होता है। जब मैं यह कहता हूं कि देश को सौ-दो सौ करोड़ या पांच सौ-हजार करोड़ के निवेशक चाहिए तो लोग ताने क्यों देते हैं – ‘इतना पैसा जमा कर क्या करोगे?’, ‘पीछे रह जानेवाले ही मजे करेंगे’, ‘यह सब मोह-माया है?’ क्या यही सवाल वे अपने माता-पिता या दादा-परदादा से पूछते हैं, जिन्होंने अपने जीवन में जो भी बचा-खुचा जोड़ा, वह संतानों के लिए छोड़ गए – चाहे वह सौ रुपए हों या सौ करोड़? क्या धन संचय करना कोई पाप है या वह जिम्मेदारी है? क्या अगली पीढ़ी को बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, अवसर और सुरक्षा देना गलत है? अगर पिछली पीढ़ियां ‘कुछ साथ नहीं ले गर्इं’ फिर भी कुछ छोड़कर गर्इं तो आज की पीढ़ी से यह नैतिक अधिकार किसने छीन लिया कि वह बड़ा सोचे? अब अमेरिका को ही देख लीजिए। क्या वह केवल सैन्य ताकत से दुनिया में प्रभावशाली है या इसलिए क्योंकि वह निवेशकों का देश है – जहां लाखों नहीं, बल्कि हजारों ऐसे निवेशक हैं जो पूरी की पूरी कंपनियां, सेक्टर और कभी-कभी देशों के बराबर आर्थिक क्षमता रखते हैं? अंतरराष्ट्रीय मंच पर दस-बीस करोड़ की कोई हैसियत नहीं होती, वहां पांच हजार करोड़ भी छोटी राशि मानी जाती है। वहां खेल बड़े पूंजीपति और संस्थागत निवेशक खेलते हैं। तो सवाल यह है कि अगर भारत को भी ताकतवर बनना है तो क्या हमें साधु बनकर संतोष का पाठ पढ़ाना चाहिए या बड़े निवेशकों की फौज खड़ी करनी चाहिए? क्या पूंजी निर्माण को हेय दृष्टि से देखकर हम वैश्विक मंच पर सम्मान पा सकते हैं या फिर यही सोच हमें आर्थिक गुलामी की ओर ले जाएगी? आखिर में सवाल सिर्फ इतना है – क्या आप चाहते हैं कि भारत वेनेजुएला बने या अमेरिका जैसे आत्मनिर्भर निवेशक-आधारित राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़े? अगर उत्तर दूसरा है तो पैसा बनाने वालों को प्रेरित करना अपराध नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया है। और जो लोग हर बार साधुता का उपदेश देकर इस सोच को कुचलना चाहते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि कमजोर नागरिकों से कभी मजबूत देश नहीं बनते।
(लेखक आर्थिक निवेश मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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