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स्नान-दान का माह माघ

शीतल अवस्थी

प्रत्येक मनुष्य के मन में निर्मलता तथा श्रद्धा का होना आवश्यक है। इस विषय में पद्म पुराण में एक बड़ी रोचक कथा है कि प्राचीन काल में नर्मदा के तट पर एक बहुत विद्वान ब्राह्मण रहते थे, जिनका नाम सुब्रत था। विद्वान होते हुए भी उन्होंने धर्म का कोई काम न किया, खूब धन कमाया, जो बाद में चोरी हो गया। उन्हें धन की नश्वरता का ज्ञान हुआ। वे उद्विग्न होकर पश्चाताप करने लगे, तभी उन्हें एक आधा मंत्र याद आया, जिसका सार था कि जीवन उद्धार के लिए माघ स्नान किया जाना चाहिए। उन्होंने नर्मदा में नौ दिन स्नान किया। दसवें दिन मृत्यु हो गई। उन्हें स्वर्ग तथा मोक्ष की प्राप्ति हुई। इस प्रकार माघ स्नान की अपूर्व महिमा है। शास्त्रों में विशेषकर निर्णय सिंधु में कहा गया है कि इस मास में कम से कम तीन दिन अथवा एक दिन शीतल जल के स्नान से भी महापुण्य की प्राप्ति होती है।
माघ मास की कुछ विशेष तिथियां स्नान के सत्व की महिमा को अधिक प्रभावशाली बनाती हैं। जैसे कृष्ण पक्ष की षट्तिला एकादशी जिसमें छह प्रकार से तिलों का व्यवहार किया जाता है। तिलों के जल से स्नान, तिल का उभटन, तिल से हवन, तिल मिले जल का पान, तिल का भोजन तथा तिल का दान करने से समस्त पापों का नाश होता है। इस दिन काले तिल तथा काली गाय के दान का भी बड़ा महात्म्य है। इसके बाद कृष्ण पक्ष की मौनी अमावस्या अति पवित्र है क्योंकि इस दिन मौन रहकर अथवा मुनियों के समान आचरणपूर्वक स्नान-दान करने का विशेष महत्व है। इस दिन त्रिवेणी अथवा गंगा तट पर स्नान-दान की अपार महिमा है। स्नान के बाद तिल के लड्डू, तिल का तेल, आंवला, वस्त्रादि का दान करना चाहिए। इस दिन यदि रविवार, व्यतिपात योग और श्रवण नक्षत्र हो तो ‘अर्धोदय योग’ होता है जिसमें स्नान-दान का फल भी मेरू समान हो जाता है। माघ शुक्ल पंचमी को विद्या, बुद्धि, ज्ञान और वाणी की अधिष्ठात्री देवी भगवती सरस्वती की पूजा होती है। ब्रह्मॢ वैवर्त पुराण के अनुसार, इनका जन्म श्रीकृष्ण के कण्ठ से हुआ। ऋग्वेद में उनकी महिमा का गान हुआ है। अत: यह दिन उनके आविर्भाव दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसके बाद शुक्ल पक्ष की सप्तमी, अचला सप्तमी का व्रत आता है। इसका महात्म्य भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि इस दिन स्नान-दान, पितरों के तर्पण व सूर्य पूजा से तथा वस्त्रादि दान करने से व्यक्ति बैकुण्ठ में जाता है। इस व्रत को करने से वर्ष भर रविवार व्रत करने का पुण्य प्राप्त होता है। इसके बाद शुक्ल अष्टमी को भीमाष्टमी के नाम से जाना जाता है। इसी तिथि को भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर प्राण-त्याग किया था। इस दिन उनके निमित्त स्नान-दान तथा माधव पूजा से सब पाप नष्ट होते हैं।

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