हिमांशु राज़
लंबे अंधेरे वनवास के बाद अक्षय खन्ना ‘धुरंधर’ से लौटे तो जैसे टूटा दिल फिर धड़क उठा। उनकी यह वापसी एक भावुक सैर है, जहाँ हर नजर में दर्द की गहराई छिपी है। बॉलीवुड के संवेदनशील योद्धा अक्षय हमेशा उन किरदारों से रूबरू होते रहे हैं जो आंसुओं की भाषा बोलते हैं। ‘धुरंधर’ में उनका पात्र एक आहत आत्मा है – सत्ता के तूफान में उजड़ा परिवार, खोया विश्वास, और अंतस की करुणा से लिपटा संघर्ष। निर्देशक ने उन्हें ऐसा भावनाओं का आलम दिया जहाँ उनकी हर साँस में पीड़ा महसती है।फिल्म की रूहानी कथा एक व्यक्ति के हृदय-विदारक सफर पर बुनी है, जो अपनों की बलि चढ़ाकर खुद को खो बैठता है। अक्षय खन्ना ने इस किरदार को इतने गहन भाव से जिया कि दर्शकों की आँखें नम हो जाती हैं। एक मार्मिक दृश्य में जब वे बेटे की तस्वीर थामे फफकते हैं, तो सारा सिनेमा हॉल सिसक उठता है। लंबे ब्रेक ने उनके अभिनय को आंसुओं की नमी से सींच दिया। ‘दीवानगी’ में जहां उन्होंने पागलपन के दर्द को जीया, वहीं ‘दृश्यम’ में पुलिस अधिकारी के रूप में अपराध की पड़ताल करते हुए नैतिक द्वंद्व और मानवीय संवेदनाओं को इतनी गहराई से निभाया कि दर्शक उनके संघर्ष में डूब जाते हैं। ‘धुरंधर’ में वही भावुकता उफान मारती है – बदले की आग में जलता प्रेम, क्रोध के नीचे छिपी ममता। उनकी कँपती आवाज हर शब्द को रुला देती है, मानो खुद की जिंदगी का दर्द उकेर रहे हों।बॉलीवुड की चकाचौंध में अक्षय का अभिनय एक उदास चाँदनी है, जो रूह को भिगो देती है। सह-कलाकारों के बीच वे भावनाओं का सैलाब ला देते हैं। एक हृदयस्पर्शी संवाद में पत्नी से विदा लेते हुए उनकी नम आँखें दर्शकों के सीने चीर देती हैं। ‘दृश्यम’ की तरह यहाँ भी उनका अधिकारी-रूप भावुकता की चरम सीमा छूता है। यह उनकी कला है – कमजोरियों को गले लगाकर रो पड़ना। फिल्म भ्रष्टाचार के घावों को छूती है, और अक्षय का पात्र हर उस परिवार की पीड़ा बन जाता है जो टूट चुका है।’धुरंधर’ समाप्ति पर अक्षय की अदाकारी आंसुओं की बूंदों सी बिखर जाती है, दिल में एक मीठा दर्द छोड़कर। लंबे अंतराल के बाद यह भावुक वापसी प्रशंसकों के सूखे मन को हरा-भरा कर देती है। उन्होंने साबित किया कि सच्ची अदाकारी रूह की पुकार है। यह परफॉर्मेंस आंसुओं में डूबी लम्बे अंतराल तक याद की जाने वाली कृति बनेगी।
