सुनील ओसवाल
मुंबई की लोकल ट्रेनों की भीड़ हो, ठाणे की रात की गश्त, कल्याण के उत्सव बंदोबस्त, पुणे की चुनावी ड्यूटी, नासिक की धार्मिक यात्राएं या नागपुर के संवेदनशील इलाके-महाराष्ट्र की हर सुरक्षा तस्वीर में एक चेहरा कॉमन है: होमगार्ड। लेकिन यही होमगार्ड आज पूरे राज्य में एक ही सवाल पूछ रहे हैं-हम सालभर कब काम करेंगे?
राज्य में करीब ५० हजार होमगार्ड जवान हैं। पुलिस के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े ये जवान हर मोर्चे पर तैनात हैं, लेकिन इनके जीवन में स्थायित्व नहीं है। न नियमित काम, न तय मानधन, न सामाजिक सुरक्षा।
मुंबई में रेलवे स्टेशन, बाजार, धार्मिक स्थलों पर होमगार्ड स्थायी रूप से दिखाई देते हैं। लेकिन उनकी ड्यूटी अस्थायी है। ठाणे और कल्याण में रात की पेट्रोलिंग और कानून-व्यवस्था का बड़ा बोझ इन्हीं पर है। पुणे में चुनाव, आंदोलन, वीआईपी मूवमेंट,
सबमें होमगार्ड तैनात। नासिक में कुंभ, यात्रा, उत्सव और भीड़ नियंत्रण की रीढ़ यही बल रहा है। नागपुर में संवेदनशील इलाकों की निगरानी में भी यही सबसे आगे हैं।
हर शहर इन्हें ‘जरूरी’ मानता है, लेकिन सरकार इन्हें ‘स्थायी’ मानने को तैयार नहीं।
२०१९ में सरकार ने होमगार्ड को ३६५ दिन काम देने का पैâसला लिया था। तब कहा गया था कि यह निर्णय स्थायी किया जाएगा, ताकि जवानों को नियमित काम और सम्मानजनक जीवन मिल सके। लेकिन छह साल बाद भी वह पैâसला सिर्फ कागजों में जिंदा है।
मैदान में हकीकत यह है कि होमगार्ड को जब जरूरत होती है, तब बुलाया जाता है। जब काम खत्म, तो घर बैठा दिया जाता है। कई जवान बताते हैं कि महीने में मुश्किल से १०–१२ दिन ड्यूटी मिलती है। उसी मानधन में मुंबई, ठाणे, पुणे जैसे शहरों में घर चलाना मुश्किल हो गया है। होमगार्ड पुलिस के साथ वही काम करते हैं-भीड़ नियंत्रण, सुरक्षा, ट्रैफिक, चुनाव, त्योहार, संवेदनशील बंदोबस्त। फर्क सिर्फ एक है: पुलिस को वेतन, भविष्य और सुरक्षा मिलती है, होमगार्ड को सिर्फ आदेश।
होमगार्ड संगठन बार-बार कहते रहे हैं कि २०१९ का पैâसला लागू किया जाए। आंदोलन हुए, ज्ञापन दिए गए, आश्वासन मिले। लेकिन सरकार हर बार मुद्दे को टालती रही। सूत्रों के मुताबिक, सरकार इस पैâसले से इसलिए पीछे हट रही है क्योंकि जैसे ही ३६५ दिन काम लागू होगा, मानधन, सुविधाएं और जवाबदेही तय करनी पड़ेगी और यही वह मोड़ है, जहां सिस्टम असहज हो जाता है।
चुनाव आते हैं तो यही होमगार्ड बूथ पर खड़े होते हैं। त्योहार आते हैं तो यही भीड़ संभालते हैं। आपदा आती है तो यही सबसे पहले बुलाए जाते हैं। लेकिन जब सवाल उनके भविष्य का आता है, तो सरकार की फाइलें खामोश हो जाती हैं। आज मुंबई से नागपुर तक महाराष्ट्र की सुरक्षा व्यवस्था एक ऐसे बल के भरोसे चल रही है, जिसकी अपनी जिंदगी असुरक्षित है। और यही इस पूरे सिस्टम पर सबसे बड़ा सवाल है- जो राज्य की सुरक्षा करता है, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन लेगा?
पड़ताल का सवाल यह है कि जब जिम्मेदारी स्थायी है, तो नौकरी अस्थायी क्यों?
