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संडे स्तंभ : पधारो, भाग्यविधाता!

विमल मिश्र
मुंबई

‘मतदान के बाद उंगली पर लगी स्याही दिखाइए और होटल और रेस्त्रां में खाना खाने पर १५ से २० फीसदी डिस्काउंट पाइए।’ ताड़देव के एक रेस्त्रां के बाहर इस आशय का इश्तेहार लगा है। यही इत्तिला कई और रेस्त्रां के बाहर है। अगले गुरुवार जब आप मुंबई महानगरपालिका के चुनाव में वोट देकर बाहर निकलें तो होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन ऑफ वेस्टर्न इंडिया के इस ऑफर का फायदा उठा सकते हैं। मताधिकार के लिए लुभाने वास्ते वसई-विरार के होटल एसोसिएशन के साथ वहां की महानगरपालिका ने बस किराए में छूट का एलान किया है। वहां के ऑटोरिक्शा संघ ने भी किराए में ५० प्रतिशत छूट की घोषणा की है। ऐसे ही दूसरे ऑफर भी हैं।
मामला अब सिर्फ फरियाद का नहीं रहा, फरमान तक आ गया है। मुंबईकर वोट के दिन घर नहीं बैठे रहें इसलिए महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई की करीब ७०,००० हाउसिंग सोसाइटियों को जवाबदेह बना दिया है। निजी स्तर पर यही प्रयास कुछ कंपनियां भी कर रही हैं। संगठनों, सोशल मीडिया और वेबसाइट्स भी अपनी जिम्मेदारी संभालने में लगे हैं। तकरीबन हर जगह युवा मतदाताओं ने ही नेतृत्व संभाला हुआ है, जो चुनाव की मुख्यधारा का हिस्सा बनकर विभिन्न फोरम्स पर वोटिंग से लेकर प्रचार और शासन तक पर चर्चा ही नहीं कर रहे, जवाबदेही भी मांग रहे हैं।
‘हर वोट मायने रखता है – आपके अपने वोट सहित’ वोट फॉर मुंबई की समझाइश है, ‘जब आपके पास आवाज है तो उसका उपयोग भी कीजिए। अपने वोट से मुंबई को बदल डालिए।’ उसे आपसे वादा चाहि‌ए, ‘मैं वोट देने का वचन देता हूं।’ हर दूसरा मुंबईकर वोट नहीं देता। मध्यम वर्ग के तो तीन में से दो लोग वोट नहीं देते, अमीर तो और भी कम। मुंबई फर्स्ट के एक अधिकारी ने बताया, ‘मतदान के लिहाज से देश और महाराष्ट्र ही नहीं, मेट्रो सिटीज की तुलना में भी मुंबई (२०२४ के लोकसभा चुनाव में ५२.४ प्रतिशत व विधानसभा चुनाव में ५३.९२ प्रतिशत) फिसड्डी है, खासकर उसके पॉश इलाके।’ बीते मनपा चुनाव में भी मुंबईकरों ने जरूर कुछ ज्यादा उत्साह दिखाया ५५.५३ प्रतिशत (२०१२ के बीएमसी चुनाव के १०.७८ प्रतिशत ज्यादा) वोट डालकर, वरना इसके पहले के चार चुनावों में मतदान ४५ प्रतिशत से ज्यादा कभी बढ़ नहीं पाया था।
मुंबई जैसे जागरूक शहर – जो देश की कारोबारी राजधानी है – के लिए यह बहुत विरोधाभासी है। देश की प्रगति व हर गतिविधि में बढ़-चढ़कर योगदान करने और सबसे अडवांस्ड कहलाने वाले मुंबईकर – जिनकी महानगरपालिका का अकेला बजट (२०२५-२६ में ७४,४२७ करोड़ रुपए) जो देश के कई राज्यों के बजट से भी ज्यादा है – मतदान के प्रति आखिर क्यों इतने उदासीन हैं, समझ में आनेवाली बात नहीं है। नौकरीपेशा सत्यदेव पाठक बताते हैं, ‘कोई भी वैंâडिडेट पैसे या रुतबे के लिए वोट मांगता है, समाज की भलाई से उसका कोई लेना-देना नहीं होता।’ बिजनेसमैन राजीव बहल नाउम्मीद नहीं हैं। उनकी उम्मीदों की वजह है बीते लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अधिक मतदान का ट्रेंड।
वोटर्स को खींच लाएंगे ये उपाय?
चुनाव आयोग: वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने के लिए राज्य चुनाव आयोग ने बैनर, पोस्टर, विज्ञापनों और रेडियो कार्यक्रमों के जरिए कई पहलें की हैं। चुनाव के दिन सार्वजनिक छुट्टी और कर्मचारियों को कामकाजी घंटों में छूट की घोषणा के साथ आयोग अपने अभियान के लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी, सोशल मीडिया, मोबाइल ऐप्लिकेशंस, रैलियों व सामुदायिक रेडियो के इस्तेमाल के साथ हाउसिंग सोसायटियों, बैंकों, कारोबारी संगठनों, कार्पोरेट घरानों, एनजीओज, यूनिवर्सिटी व कॉलेजों का पहले से ही उपयोग कर रहा है।
महानगरपालिका: फौरी उपायों के अलावा बीएमसी के चुनाव विभाग ने कुछ गैर परंपरागत कदम भी उठाए हैं। मसलन, लोकल ट्रेनों और बेस्ट बसों पर प्रेरक वाक्य पेंट करना और शहर के महत्वपूर्ण नाकों, एयरपोर्ट, आक्ट्रॉय चौकियों, एटीएम कियोस्क पर एलईडी और होर्डिग्ज लगाना। हाउसिंग सोसायटीज और कॉलेजों के सहयोग से भी अभियान चलाया जा रहा है।
सोशल मीडिया ग्रुप्स, वेबसाइट्स व ऐप्लिकेशंस: ध्ज्ीaूग्दह ँत्aम्व्Dदू आगाह करता है, ‘वोट नहीं दोगे, तो तुम्हें शिकायत का हक भी नहीं।’ Dदह’ू न्न्दूा. एातम्ू के घोषवाक्य के साथ श्ल्स्ंaग्न्न्दूो राजनीतिज्ञों की कुंडली मतदाताओं के समक्ष खोलने में लगा है। श्ीa न्न्दूा श्ीa प्aq, भ्दल्ूप् ख्ग् Aैर्aै और न्न्दूींग्ूा जैसे फोरम्स ने अपनी ऑनलाइन ऐक्टिवीटीज से लाख मतदाताओं तक पहुंच बनाई है। ख्हदै भ्दल्r ण्aह्ग््aूो और ग्इदrघ्ह्ग्a ने जनप्रतिनिधि की रेटिंग का अवसर दिया है। ख्हदै भ्दल्r न्न्दूा ने इलेक्शन कैंडिडेट्स के बारे में तमाम जरूरी जानकारियां मुहैया कराने के साथ खुद वोटर्स में सरकार चलाने की काबिलियत पैदा करने के लिए जरूरी डेवलपमेंट और मेंटरशिप कार्यक्रम चलाए हैं और घ् न्न्दूा fदr a ाूूँी घ्ह्ग्a ने बोगस वोटिंग रोकने की जिम्मेदारी उठाई है। न्न्दूींग्ुप्ू, ैप्दुाूेस्ब्न्दूा.ग्ह, ळर्‍उथ्घ्, झदज्त इदr थ्दव्ेaूूa, ऊप ५४५ और र्‍ाूaउ जैसे कई सोशल मीडिया ग्रुप्स, वेबसाइट्स व ऐप्लिकेशन मतदाताओं को मतदान के लिए प्रोत्साहित करने और उनके अधिकारों के प्रति जागृति फैलाने में लगे हैं।
शिक्षा संस्थान और छात्र: परीक्षाएं निकट हैं, फिर भी स्कूल-कॉलेज रैलियों व कॉम्पिटिशंस के जरिए और परीक्षा में अतिरिक्त अंकों के अवॉर्ड्स के जरिए छात्रों को प्रेरित करने में लगे हैं कि वे पैरेंट्स को वोट देने के लिए मनाएं। कॉलेज के स्टुडेंट्स न्न्दूा fदr श्ल्स्ंaग् अभियान के लिए रैलियां और नुक्कड़ नाटक कर रहे हैं। कुछ कॉलेज छात्र फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर डिजिटल मीडिया वैंâपेन शुरू करने के साथ दरवाजे-दरवाजे घूमकर मतदाताओं को – खासकर पहली बार वोट डालने वाले मतदाताओं को जागृत कर रहे हैं। कई कॉलेजों ने वोटर रजिस्ट्रेशन बूथ कायम किए हैं और कई स्टूडेंट्स को उनके कोर्स के लिए असाइनमेंट ही वोटिंग वैंâपेन के रूप में ही दे डाले हैं। कई स्कूलों ने अपने छात्रों से कहा है कि वे पैरंट्स के वोट देने के बाद उनके साथ सेल्फी लेकर पोस्ट करें।
एनजीओ: GrassRoute India, Mumbai, Haiyya, Ask How India, PARIVARTAN, Volunteers For A Better India, Association Of Muslim Professionals जैसे एनजीओ भी अपनी तरह से जागृति फैलाने में लगे हैं।
कार्पोरेट्स: महिंद्रा एंड महिंद्रा, वोडाफोन, एमसीएक्स, मॉर्गन स्टैनली, टाटा मोटर्स जैसी कंपनियों और संगठनों ने अपने कर्मचारियों को वोट देने के लिए प्रोत्साहित करने की पहल की है।
धार्मिक समुदाय: सिख गुरुद्वारों का सर्वोच्च संगठन श्री गुरुसिंह सभा, इमाम और मुफ्तियों सहित मुस्लिम धार्मिक नेता, कैथोलिक ईसाई समुदाय के राजनीतिक संगठन The Church In The City और ईस्ट इंडियन ईसाई समुदाय ने अभियान चलाया है।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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