मुख्यपृष्ठस्तंभहनीफनामा : सादगी में ढलीं सायरा

हनीफनामा : सादगी में ढलीं सायरा

हनीफ जवेरी

बचपन लड़कपन में गुजर जाता है और जवानी मस्ती में बीत जाती है, लेकिन बुढ़ापा वो दौर होता है, जिसमें अक्सर लोग न केवल अपने गुनाहों की तौबा करते हैं, बल्कि उनका झुकाव मजहब की ओर हो जाता है। ऐसा ही कुछ बदलाव अभिनेत्री सायरा बानो में भी देखने को मिला।
फिल्म ‘जंगली’ से अपने करियर की शुरुआत करनेवाली सायरा उस समय बेहद खुले विचारों वाली थीं क्योंकि उनकी पढ़ाई विदेश में हुई थी। हुस्न की मलिका सायरा इतनी तेज-तर्रार थीं कि उनसे बात करने से भी लोग डरते थे। उस दौर में उनका पहनावा भी पूरी तरह पाश्चात्य शैली का हुआ करता था, लेकिन समय के साथ उनमें काफी बदलाव आया और वे इस कदर बदल गर्इं कि आज उन्हें देखकर यह विश्वास ही नहीं होता कि ये वही साठ और सत्तर के दशक की सायरा बानो हैं। यह परिवर्तन उनमें लगभग २०-२५ वर्ष पहले तब आया, जब उन्होंने मौलाना यूनुस पलनपुरी का बयान (प्रवचन) ध्यानपूर्वक सुना। इसके बाद सायरा बानो ने अपने पहनावे से लेकर बातचीत के अंदाज तक में बदलाव कर लिया।
वक्त के साथ सायरा का झुकाव अपने मजहब की ओर अधिक होने लगा और वो इस्लाम द्वारा निर्धारित नियमों और उसूलों का पालन करने लगीं। उन्हें यह भी ज्ञात हुआ कि यदि अल्लाह के बाद किसी को सजदा करने का आदेश होता, तो वह पति ही होता। बस फिर क्या था, सायरा ने पति दिलीप कुमार का भरपूर ध्यान रखना शुरू कर दिया, जिसे वे इबादत का ही एक हिस्सा मानती थीं। पति के खाने-पीने से लेकर हर छोटी-बड़ी आवश्यकता का वे पूरा खयाल रखती थीं। वे किसी भी समारोह में दिलीप को अकेला नहीं छोड़ती थीं और फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से वे धीरे-धीरे दूर होती चली गर्इं।
एक आदर्श पत्नी के रूप में दिलीप कुमार की जी-जान से सेवा करनेवाली सायरा को अल्लाह का खौफ इस कदर था कि उन्हें इस बात का भी डर रहता कि कहीं वे किसी चीज पर गुरूर न कर बैठें। उनकी सहेली वहीदा रहमान ने उनके जन्मदिन पर एक कीमती घड़ी तोहफे में दी थी, जिसे सायरा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। इसके बाद जब भी सायरा अपनी सहेली वहीदा से मिलतीं, वहीदा उनकी कलाई पर अपनी दी हुई घड़ी न देखकर उदास हो जातीं। धीरे-धीरे वहीदा को लगने लगा कि शायद सायरा जी को उनका तोहफा पसंद नहीं आया, इसलिए वे उसका इस्तेमाल नहीं करतीं। आखिरकार, एक दिन वहीदा ने अपनी दी हुई घड़ी के बारे में सायरा से पूछ ही लिया। तब सायरा ने बताया कि उन्होंने उस कीमती तोहफे को बहुत संभालकर रखा है, लेकिन वे उसे इसलिए नहीं पहनतीं कि कहीं उनके दिल में यह तकब्बुर न आ जाए कि वे एक महंगी घड़ी पहन रही हैं। बस इसी डर से वे उसका इस्तेमाल नहीं करतीं। वैसे भी सायरा का मानना है कि दिखावा करना भी गुनाह से कम नहीं है।
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)

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