हृदयनारायण दीक्षित
लखनऊ
मकर संक्रांति हर बरस आती है और अंग्रेजी कैलेंडर की जनवरी भी। पहली जनवरी के दिन हैप्पी न्यू इयर की शुभकामनाएं चलती हैं। हैप्पी बोलने में अंग्रेजियत है। न्यू ईयर आधुनिक है। हमारे गांव-देहात के लोग भी मुझे ‘हैप्पी न्यू ईयर’ बोलते हैं। पत्र-पत्रिकाओं में नववर्ष पर ढेर सारी सामग्री छपती है। हम भारतीय उत्सवी हैं। एक और उत्सव जोड़ लेने में कोई कठिनाई नहीं। तमाम नई घटनाओं के बावजूद नए साल का शोर कई दिन से चल रहा है। नववर्ष हर्ष-हर्ष। नववर्ष का ‘नव’ बड़ा रम्य है। बहुधा ९ का अर्थ देता है। नवग्रह का अर्थ नया ग्रह नहीं, ९ ग्रह हैं। भक्ति क्षेत्र में नवधा भक्ति है। यहां भी नव का ९ ही है। संस्कृत नवम का अर्थ भी ९वां है। नवरात्र में नव का अर्थ नया नहीं ९ रात्र ही है। नवमी तो हर पक्ष की ९वीं तिथि है। लैटिन का नवंबर भी नौवां ही है, लेकिन अंग्रेजी कैलेंडरर में ११वां माह है। लैटिन सेप्ट अंग्रेजी का सितंबर ७वां और आक्ट/अक्टूबर आठवां है। लेकिन कैलेंडर में अक्टूबर १०वां और सितंबर नवां।
अंग्रेजी कैलेंडर निर्माता जानें, उनका ज्ञान जाने। उनका कैलेंडर सिर-माथे। लेकिन प्रश्नाकुलता ठाठ मारती ही है। नव का अर्थ नया भी होता है। निराला ने ‘अमृत मंत्र नव भारत में भर दें’ लिखा ही है। युवती नवयुवती भी होती है। नवयौवन का अर्थ नौ-यौवन नहीं नया यौवन ही है। नवयुवक का नव गहन स्फूर्ति का अर्थ देता है। लेकिन नव या नए के चक्कर में ‘नवना’ या झुकना बहुत बुरा है। तुलसीदास ने ‘नवनि’ शब्द प्रयोग किया है, झुकने के लिए। मन प्रश्नाकुल है कि ३६५ दिन के वर्ष को हम जनवरी से ही क्यों प्रारंभ करें? जनवरी में नववर्ष का कोई रूपक तो होना ही चाहिए। क्या कृषि नवान्न देती है – जनवरी में क्या वन उपवन नवांकुर से भर जाते हैं? क्या जनवरी की हवाएं मधुगंधा होती हैं? क्या फल मधुरस बांटते हैं? क्या भरत भूमि किसी पुलक में होती है? क्या लोक में नवछंद उगते हैं ऐसे सारे प्रश्नों का उत्तर है – नहीं।
जनवरी में जनवरी ही नई है। जनवरी में कुछ भी नया नहीं होता। न रूप, न रस, न गंध, न स्पर्श, न कोयल की कूक और न ही लोक की हूक। प्रकृति ने जम्बूद्वीप के इस भरतखंड को बड़े प्यार से गढ़ा है। नदियां, वन, उपवन, समुद्र और पर्वत। ६ ऋतुएं हैं। यह भूमि तत्वबोध की आसनी है। जनवरी में नदियां भी उल्लसित नहीं होतीं। वन उपवन नव और अभिनव नहीं होते। सोचता हूं कि जनवरी में नया क्या है पीछे साल भी इन्हीं महीनों में सर्दी थी, कोहरा था। कड़ाके की सर्दी के कारण जनवरी खांसते-हांफते हुए आई है। सर्दी के साथ वर्षा भी।
गरीब लोग मर रहे हैं। पशु-पक्षी लुके-छुपे हैं। काहे का नववर्ष पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है २४ घंटे में। दिन-रात बनते हैं। यह प्रकृति का नियम है।
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है ७२० अहोरात्र में। यह बात वैदिक साहित्य में है। ७२० अहोरात्र दिन-रात के जोड़े हैं। इनसे मिलकर वर्ष बनता है। पृथ्वी परिक्रमा भी प्रकृति का नियम है। कालचक्र की गति में प्रथम और अंत नहीं होता तो नया साल कहां से आया। नए साल की गिनती कहां से शुरू हुई? क्यों हुई? प्रश्न है कि नये साल की गिनती पहली जनवरी से ही क्यों? बेशक अंग्रेजी जनवरी बिंदास है, लेकिन बसंत जैसी मधुवाता नहीं। बसंत से क्यों नहीं, फागुन या चैत्र से क्यों नहीं? मार्च या अप्रैल से क्यों नहीं? जनवरी से ही क्यों? सरासर जबर्दस्ती है। अंग्रेजी विद्वानों ने बिना सोचे-समझे ही दस माह का कैलेंडर बनाया। उनमें झगड़ा हुआ बाद में जनवरी-फरवरी जोड़ दी। सातवां माह नवां हो गया। आठवां अक्टूबर था, दसवां हो गया। दिसंबर का अर्थ ही दसवा होता है, लेकिन १२वां हो गया। तो भी यह कैलेंडरर धांसू है।
अंग्रेजी वैâलेंडर अंग्रेजों का है। मित्र लोग तमाम रंगीन वैâलेंडर दे गए हैं। सौजन्य पढ़ने लायक होता है। कंपनियों के प्रचार होते हैं। सरकारी कामकाज के लिए तारीखें हैं। अंग्रेजी कैलेंडर दीवार पर टंगा है। हमारी अपनी तिथियों और महीनों का जीवन भी टंगा हुआ है। इस कैलेंडर का विवेचन जरूरी है। हम अद्भुत राष्ट्र हैं। विद्वान अंग्रेजी में सोचते हैं, खुश होते हैं। जनवरी में नए होते हैं। बसंत में मधुगंधा नहीं होते। ऋतुराज बसंत का स्वागत नहीं करते। वर्षा ऋतु अतिरिक्त मधुरसा यहां अंग्रेजी परंपरा के अलावा सब कुछ सांप्रदायिक है। सिर्फ अंग्रेजियत पर ही सर्वानुमति है और भारतीय परंपरा के लिए अंतर्कलह।
अस्तित्व प्रतिपल नया है। देखने और अनुभव करने की यह दृष्टि अखंड है। इसमें गए और आए का भेद नहीं। बीते और प्रत्यक्ष की समय विभाजक रेखा नहीं। अस्तित्व प्रतिपल नया। पुनर्नवा। अस्तित्व के आशीष हैं ‘पुनि पुनि पुनर्नवा भव।’ यह आलेख पढ़ना शुरू करते समय हम नए थे। शुरुआत थी। १०-१५ पंक्तियां पढ़े, नया क्षण आया, हम फिर से नए। समाप्त करने तक बारंबार नए। हरेक सूर्योदय नया है, हरेक चंद्र भी। कली नई है, पुष्प भी नए हैं। वर्षा की हरेक बूंद नई है। प्रकृति का हरेक रूप-रस नया है। लेकिन नए का अलग अस्तित्व नहीं है। वह पुराने का ही विस्तार है। अतीत व्यतीत नहीं होता। पुराना मरता नहीं। दिक्काल रूप बदलता है। अस्तित्व में कुछ भी नया या पुराना नहीं होता। अस्तित्व नूतन नहीं चिरंतन है। सदा से है, सदा रहता है। कभी भी नष्ट नहीं होता। देश काल के प्रभाव में हम उसे नया या पुराना देखते कहते हैं।
काल अस्तित्व के परे नहीं है। भारतीय चिंतन में सृजन और प्रलय की धारणाएं हैं। प्रलय में गति समाप्त हो जाती है इसलिए काल नहीं होता। दिवस और रात्रि भी नहीं होते। सृजन में अस्तित्व उगता है। गतिशील होता है, गति से समय आता है। तब समय की गणना। दिन, रात, मास, वर्ष या साल काल के ही अंग हैं। ऋग्वेद में सृष्टि सृजन के पूर्व के अस्तित्व का वर्णन है ‘तब न रात्रि थी, न दिन।’ अर्थात समय नहीं था। वायु भी नहीं थी। ‘वह एक’ अस्तित्व वायुहीन वातायन में अपनी क्षमता के बल पर सांस ले रहा था – ‘अनादीवातं स्वधया तदेकं।’ सब तरफ गहन अंधकार और जल ही जल – अप्रकेत सलिलं था। वह अगाध जलों से प्रकट हुआ। ‘प्रकट’ नया जन्म नहीं है। वह एक पहले भी था। भाषा में ‘पहले या बाद में, प्रथम या द्वितीय’ शब्द समय बोधक है। लेकिन प्रकट होने तक समय नहीं था। यूनानी दार्शनिक थेल्स जल को आदि तत्व मानते थे।
जल से सृष्टि की धारणा ऋग्वेद में है और सृष्टि के साथ गति व समय उगने की भी। ऋग्वेद में समय प्रवाह के प्रथम बिंदु को संवत्सर कहा गया है। हमारे जैसे रूढ़िवादियों का मन इसी संवत्सर से बंधा हुआ है। भारत के लिए यह रम्य मधु मुहूर्त भी है। प्रकृति तरुण, अरुण, मधुरस से उफनाती है। मधुगंध हहराती है। मधुछंद उगते हैं। संवत्सर की मुहूर्त में। यही मुहूर्त अंतर्राष्ट्रीय नववर्ष भी है। केवल मनुष्य के लिए नही, पशु-पक्षी, चंद्र-सूर्य आदि के लिए भी। वे भी इसी मुहूर्त से बंधे हुए हैं। हम सब इसी मुहूर्त पर नववर्ष का हर्ष पाते हैं।
(लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।)
