सुरेश मिश्र
कंपकंपाती ठंड, विकराल कोहरा, सुर-सुर करती हवा। नायिका परदेसी प्रियतम का रास्ता जोहते-जोहते थक गई। उसके सारे जतन फेल हो गए। खिचरी नजदीक आ रही थी, उसने सोचा कि प्रियतम अपनी बहन और भांजे को अपनी जान से ज्यादा प्यार करते हैं। उसने मोबाइल उठाया और डायल कर दिया साजन के पास –
ढूंढ़ी बन्हले, ढुंढ़ा बन्हले, हम भुजइले लाई
सइयां जल्दी आवा हो
के खिचरिया लइके जाई, सइयां जल्दी आवा हो
कवने टरेनियां क टिकस कटइल्या हो
लागि गइली जनवरी, अबइ ले न बतइल्या हो
आवा नाहीं दुनिया म होई जग हंसाई
सइयां जल्दी आवा हो
के खिचरिया लइके जाई, सइयां जल्दी आवा हो
ननदी रोवत बानी, भइया नाहीं अइले
लागेला बहिनी के अपने भुलइले
फोनवा पे बार-बार केतना समुझाई
सइयां जल्दी आवा हो
के खिचरिया लइके जाई, सइयां जल्दी आवा हो
भैने तोहार बोलइं मामा हमरे अइहैं
लगल बा धुरंधर हमके सुलेमवां देखइहैं
रहिया जोहत हउवें, बना जिनि कसाई
सइयां जल्दी आवा हो
के खिचरिया लइके जाई, सइयां जल्दी आवा हो
हंसी अउ ठिठोली हमरा लागइ जइसे गोली हो
बुआ कहिया बनबइ, ई ननदिया क बोली हो
निरमोही पिया, कइसे ओनके हम बताई
सइयां जल्दी आवा हो
के खिचरिया लइके जाई, सइयां जल्दी आवा हो
पतिया, अफतिया, संसतिया से थकलीं
रोज-रोज वाली दुरगतिया से थकलीं
फोनवा पे काउ-काउ तहरा हम बताई
सइयां जल्दी आवा हो
के खिचरिया लइके जाई, सइयां जल्दी आवा हो
तहरा बुझाए नाहीं जियरा क बतिया
अगिया बुझाए कइसे पिया परदेसिया
ठंडी न जाई हमरी, ओढ़ि के रजाई
सइयां जल्दी आवा हो
के खिचरिया लइके जाई, सइयां जल्दी आवा हो
