-पुरस्कारों की रोशनी में छुपी मुंबई लोकल की हकीकत
-अश्विनी वैष्णव के ‘छह संकल्प’ बनाम रोज मरता यात्री
जेदवी / मुंबई
देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में लोकल ट्रेन से सफर अब मजबूरी नहीं, रोज का जोखिम बन चुका है। जानलेवा भीड़, लोकल डिब्बे से लटकते यात्री, महिला डिब्बों में बढ़ते अपराध, इन सब पर न रेलवे प्रशासन की नींद टूट रही है और न ही सरकार की चुप्पी। हर दिन यात्री जान हथेली पर लेकर सफर कर रहा है, मगर सत्ता के गलियारों में ‘सब ठीक’ का ढोल पीटा जा रहा है।
उम्मीद थी कि केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव मुंबई की जर्जर लोकल व्यवस्था पर कोई ठोस रणनीति पेश करेंगे, लेकिन यशोभूमि के भव्य मंच से २०४७ के विकसित भारत का सपना तो दिखाया गया, लेकिन २०२६ की बदहाली पर एक शब्द भी नहीं बोला गया। सवाल यही है।
रेलवे को ‘औपनिवेशिक मानसिकता’ से मुक्त करने का दावा एक बार फिर दोहराया गया। १०१ अधिकारियों को अति विशिष्ट रेल सेवा पुरस्कार और २६ जोनों को शील्ड देकर उपलब्धियों का जश्न मनाया गया, लेकिन उसी रेलवे में रोज लेट ट्रेनें, ट्रैक मेंटेनेंस की लापरवाही, भीड़ और सुरक्षा में सेंध की खबरें लगातार सामने आ रही हैं।
रेल मंत्री ने छह संकल्प गिनाए नवाचार, सुधार, ट्रैक मेंटेनेंस, सुरक्षा, ट्रेनिंग रिफॉर्म और औपनिवेशिक सोच का अंत, लेकिन जमीनी सच्चाई कड़वी है। नवाचार फाइलों तक सीमित, जमीन पर वही पुराना सिस्टम। ५२ हफ्तों में ५२ सुधार का दावा, मगर यात्रियों को राहत नदारद। सुरक्षा सर्वोच्च कहने के बावजूद हादसे और लापरवाही जारी। ट्रेनिंग रिफॉर्म की बातें, जबकि फील्ड स्टाफ संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।
पुरस्कारों की बारिश, जवाबदेही गायब
पिछले एक दशक की ‘परिवर्तनकारी प्रगति’ गिनाई गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि रोज सफर करनेवाला यात्री आज भी खुद को असुरक्षित क्यों महसूस करता है। अफसरशाही की जड़ता, फाइलों में उलझी योजनाएं और फील्ड लेवल की अनदेखी, यही वह औपनिवेशिक मानसिकता है, जिसे खत्म करने की बातें की जा रही हैं। रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष ने गति, आराम और सुरक्षा को प्राथमिकता बताया। अत्याधुनिक तकनीक के दावे हुए मगर यात्रियों का अनुभव इन दावों की पोल खोल देता है।
