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तीर-ए-तौसीफ : ट्रंप का पलायन… दुनिया का इम्तिहान

तौसीफ कुरैशी

डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ अब नारा नहीं रहा, एक जिद बन चुका है और जिद जब सियासत की गाड़ी हांकने लगे तो मंजिल नहीं, मलबा मिलता है। ६६ अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और संधियों से अमेरिका के बाहर निकलने का एलान कोई प्रशासनिक पैâसला नहीं, यह उस सोच का इजहार है, जो दुनिया को साझेदारी नहीं, सौदे की तरह देखती है, जो बहस नहीं, धमकी में यकीन रखती है और जो नेतृत्व नहीं, हुंकार को ताकत समझती है। यह पलायन असल में अमेरिका का दुनिया से नहीं, दुनिया के भविष्य से अलग होना है और ऐसे अलगाव का अंजाम आत्मघाती ही होता है।
कूटनीतिक दखल
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन प्रâेमवर्क कन्वेंशन, आईपीसीसी, इंटरनेशनल सोलर अलायंस इन नामों के पीछे कागजी ढांचे नहीं, इंसानी जिंदगी की बुनियादें हैं। इनसे बाहर निकलना करदाताओं के पैसे की बचत नहीं, आनेवाली नस्लों की सांसों पर ताला लगाना है। ट्रंप प्रशासन कहता है ये संस्थाएं अमेरिकी हितों के खिलाफ हैं। असल बात यह है कि ये संस्थाएं उस अहंकार के खिलाफ हैं जो दुनिया को अपने आईने में देखना चाहता है। सॉफ्ट पावर कोई मुफ्त की खैरात नहीं होती, यह भरोसे, नैतिकता और साझे मकसद से बनती है। अमेरिका आज वही पूंजी आग में झोंक रहा है। इस पैâसले की मार सबसे पहले उन मुल्कों पर पड़ेगी जो पहले से ही संसाधनों की किल्लत, जलवायु की मार और कर्ज की बेड़ियों से जूझ रहे हैं। भारत के लिए अनुमानित दो सौ मिलियन डॉलर का नुकसान कोई मामूली आंकड़ा नहीं यह स्कूलों, स्वास्थ्य, ऊर्जा और रोजगार के उन कार्यक्रमों की कटौती है, जिनसे आम आदमी की जिंदगी जुड़ी होती है।
आपसी मतभेद-टकराव
नाटो जैसे गठबंधन इस अलगाववाद से हिलते हैं। सहयोगी मुल्कों के मन में यह सवाल उगता है कि आज कौन, कल कौन जब भरोसा दरकता है तो सुरक्षा भी सिसकती है। ट्रंप की बयानबाजी ने साझेदारों में असुरक्षा की वह चिंगारी सुलगा दी है, जो देर-सवेर आग बनती है। नेतृत्व का अर्थ होता है जिम्मेदारी उठाना, हुंकार का अर्थ होता है जिम्मेदारी से भागना। ट्रंप ने दूसरा रास्ता चुना है। चीन के मोर्चे पर ट्रंप की रणनीति नाकामियों की फेहरिस्त है। उपभोक्ता बाजारों पर चीन की पकड़ मजबूत है, सप्लाई चेन उसकी धड़कन से चलती है, हथियारों से लेकर तकनीक तक, वह अपने पैर पसार चुका है। अमेरिका का अलगाव उसे रोक नहीं रहा, बल्कि रास्ता साफ कर रहा है। विकासशील देश अब ‘कौन साथ देगा’ नहीं, ‘कौन छोड़ेगा नहीं’ पूछते हैं और चीन इस सवाल का जवाब देने को तैयार खड़ा है।
जनता अक्ल नहीं
लैटिन अमेरिका में वेनेजुएला की घटनाएं हों या ईरान में उबाल अमेरिकी आक्रामकता ने अविश्वास को खाद दी है। देशों को लग रहा है कि वॉशिंगटन दोस्ती नहीं, दखल चाहता है। नतीजा यह कि वे दूर जा रहे हैं और अमेरिका के प्रतिद्वंद्वियों के करीब। तेल पर नियंत्रण और डॉलर की बादशाहत के ख्वाब भी अब हकीकत की चट्टान से टकरा रहे हैं। जब दुनिया वैकल्पिक ऊर्जा और बहु-मुद्रा व्यवस्था की ओर बढ़ रही हो, तब पुरानी लाठी से भविष्य को हांकना हास्यास्पद भी है और खतरनाक भी। लोकतंत्र में सबसे बड़ा अपराध जनता को कमअक्ल समझना है। ताकत जब तर्क से बेदखल हो जाती है तो नीति तमाशा बन जाती है। २०२६ का सवाल सिर्फ तारीख का नहीं रास्ते का है। सहयोग या अस्थिरता? साझेदारी या साजिश? ट्रंप के द्वारा अमेरिका का पलायन दुनिया के लिए इम्तिहान है और इम्तिहान में नकल नहीं, नैतिकता काम आती है। अगर दुनिया ने मिलकर संस्थाओं, सहयोग और इंसानी सरोकारों को नहीं बचाया तो यह रीसेट सुधार नहीं, सैलाब बनेगा। और तब कोई यह कहकर बच नहीं पाएगा कि हमें खबर नहीं थी। हमें खबर है बस हिम्मत चाहिए।
सत्यमेव जयते

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