फडणवीस-मिंधे की सरकार में महाराष्ट्र का मान कलंकित हो गया है। मराठी भाषा, मराठी संस्कृति, मराठी अस्मिता आदि को कुचलकर भ्रष्ट राजनीति कर रहे हैं। कोई भी ऐरा-गैरा, लुंगी-सुंगी मुंबई में आता है महाराष्ट्र के अभिमान को धक्का पहुंचाकर चला जाता है और मराठी शासक उसका समर्थन करते हैं। एक भयंकर तस्वीर है। तमिलनाडु का एक भिखारी भाजपा नेता, अन्नामलाई, मुंबई में भाजपा का स्टार प्रचारक अवतरित हुआ और बड़बड़ाया, ‘मुंबई का महाराष्ट्र से कोई लेना-देना नहीं है। मुंबई का महाराष्ट्र से क्या संबंध है?’ जब भाजपा का यह महाराष्ट्रद्रोही रसमलाई मंच पर भाषण दे रहा था, तब मुंबई भाजपा के कई मराठी नेता मंच पर मौजूद थे और रसमलाई की इस अमृत वाणी से उन्हें कोई चिढ़ नहीं हुई। यह उनकी नामर्दी का प्रमाण है। भाजपा का हिंदुत्व या मराठी अस्मिता से कोई संबंध था ही नहीं। सत्ता और धन के लालच में मजबूर ये लोग महाराष्ट्र के अपमान को खुली आंखों से सहन कर रहे हैं। कौन और कहां का अन्नामलाई? उसके तमिलनाडु में ही उसे कोई कुत्ता भी नहीं पूछता। तमिलनाडु में ही उसे तमिल अस्मिता और संस्कृति का गद्दार माना जाता है। इसलिए अन्नामलाई का बयान पूरे तमिल लोगों या तमिल क्षेत्र की राय को नहीं दर्शाता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री, राजनेता आदि ने अब तक मुंबई-मराठी लोगों के खिलाफ कभी जहर नहीं उगला है। चाहे वे तमिलनाडु में डीएमके के लोग हों या एआईएडीएमके वाले, सभी ने अपनी प्रांतीय और
भाषाई अस्मिता
बनाए रखने के लिए संघर्ष किया और लड़ाई लड़ी। तमिलनाडु और महाराष्ट्र ने त्रिभाषा सूत्र अनिवार्यता आदेश के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़ी और अंतत: केंद्र सरकार को त्रिभाषा सूत्र अनिवार्यता आदेश वापस लेना पड़ा। तमिलनाडु के राजनेताओं ने महाराष्ट्र के खिलाफ कभी भी ‘रस मलाई’ जैसे मूर्खतापूर्ण बयान नहीं दिए, लेकिन भाजपा ने अन्नामलाई जैसे घटिया नेताओं को ‘मुंबई’ भेजा और उनके मुंह से महाराष्ट्र विरोधी बयान दिलवाए। अगर ऐसा न होता तो राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उप मुख्यमंत्री एकनाथ मिंधे मलाई के बयान को बर्दाश्त नहीं करते। इसके विपरीत, देवेंद्र फडणवीस मलाई के बयान को दबाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं, जबकि बेबस मिंधे मंडल अन्नामलाई के बारे में कुछ भी कहने को तैयार नहीं है। अब उससे आगे बढ़ते हुए अन्नामलाई ने सरकार और मराठी माणुस को चुनौती दे दी है। वो चेन्नई में बैठकर कहता है, ‘हां, मैंने यह बयान दिया कि मुंबई महाराष्ट्र का नहीं है और मैं मुंबई आकर फिर से यही बयान दूंगा। अगर हिम्मत है तो मुझे रोको।’ इन सबके बावजूद, महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार अपनी कायरता छोड़ने को तैयार नहीं है। अन्नामलाई के बयान से पता चलता है कि भाजपा की नीति मुंबई में शिवसेना और तमिल लोगों के बीच फूट और दरार पैदा करना और उससे लाभ उठाना है। अमित शाह ने अन्नामलाई जैसे लुंगीछाप से न लड़नेवाली एक कायर सेना खड़ी की है और उन्हें सत्ता की ताकत दे दी है और फिर ये लोग खुद को शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे के विचारों का उत्तराधिकारी समझते हैं। ये लोग वाकई बालासाहेब के विचारों के उत्तराधिकारी के तौर पर
सत्ता का उपभोग कर रहे होते
तो अन्नामलाई को मुंबई से बाहर ही नहीं निकलने देते, लेकिन भाजपा और एआईएमआईएम के साथ रहकर इन लोगों ने अपनी मराठी पहचान की सुन्नत कर ली है। भाजपा और मराठी अस्मिता का कोई संबंध नहीं ही था, लेकिन शिवसेना में रहते हुए खुद को ‘हीरा’ समझनेवाले भी इन खटमलों की संगति में आकर भ्रष्ट हो गए हैं। ‘उप’ मुख्यमंत्री एकनाथ मिंधे संभाजीनगर में शाह सेना के लिए प्रचार करने गए और सीना ठोकते हुए बोले, ‘हम मर्द हैं। हमने बालासाहेब के विचारों वाली सरकार का तख्तापलट किया। तांगा उलट दिया।’ सभी मराठी लोगों को इस बयान को गंभीरता से लेना चाहिए। एक मिंधे मंडल ने यह स्वीकार किया हैं कि उद्धव ठाकरे की सरकार हिंदूहृदयसम्राट बालासाहेब के विचारों पर ही आधारित थी और ‘हमने भाजपा-अमित शाह के आदेश पर बालासाहेब के विचारों वाली सरकार गिराई, तांगा उलट दिया’ ऐसी शेखी बघारकर साबित कर दिया कि वे भाजपा के सामने बेबस हैं। ऐसे बेबस लोगों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे अन्नामलाई पर हमला करेंगे या उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगे। कृपाशंकर, अन्नामलाई के महाराष्ट्र विरोधी बयान के खिलाफ विरोध तक न करनेवाले शासकों और उनके समर्थकों को ‘षंढ’ के अलावा और क्या कहा जा सकता है? जिस तरह आत्मसमर्पण का सफेद झंडा फहराकर घुटने टेके जाते हैं, उसी तरह इन लोगों ने षंढता का झंडा फहराकर महाराष्ट्र के शौर्य और आत्मसम्मान को कलंकित किया है। अन्नामलाई ने फिर से मुंबई आकर वही बयान देने की बात कही है। मराठी माणुस ने इस बात को गंभीरता से ले लिया है!
