मुंबई समेत २८ महानगरपालिका का प्रचार खत्म हो गया है। माहौल इतना बिगड़ गया है कि लगता है जैसे यह चुनाव सिर्फ गुंडों, भीड़ और पैसे वालों का ही है। पुणे जैसे शहर में खास चुनावों के लिए गुंडे गजा मारणे की रिहाई हो गई है। मुंबई में भाजपा ने तमिलनाडु से गुंडा प्रवृत्ति वाले खतरनाक लोगों को लाकर मराठी लोगों को धमकाने की ‘अण्णागीरी’ की। मराठी माणुस के लिए एक भी भाजपावाला या ‘शाह’ सेनावाला खड़ा नहीं हुआ। उल्टा, मुख्यमंत्री ने मराठी माणुस को धमकाने वाले भाजपा के ‘अण्णा’ का समर्थन किया। महाराष्ट्र स्थापना के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ। इसीलिए गुस्साए मराठी माणुस ने शिवाजी पार्क में फडणवीस और मिंधे की समापन सभा का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया। ११ तारीख को उसी शिवतीर्थ पर ‘ठाकरे बंधुओं’ की एक विराट सभा संपन्न हुई। इसमें अपार जनसैलाब उमड़ पड़ा, लेकिन १२ तारीख को फडणवीस-मिंधे की सभा के लिए २२ हजार कुर्सियां लगाई गई थीं। उसमें मुश्किल से ढाई हजार कुर्सियां भरीं और उनमें से अधिकांश ‘बाहरी’ लोगों को पैसे देकर लाए जाने का खुलासा हुआ। यह सच है कि सभा की धज्जियां उड़ गर्इं, लेकिन मतदाताओं को पैसों से खरीदकर चुनाव जीतने का खेल अगली दो रातों में होगा। प्रचार भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन पैसों का ‘जोर’ शुरू हो जाएगा। मंत्री गणेश नाईक कहते हैं, तदनुसार यह सिर्फ हराम का पैसा है। मराठी जनता हराम का पैसा लेकर महाराष्ट्र को न बेचें, अपने बच्चों का भविष्य खराब न करें। यह लड़ाई मराठी माणुस के अस्तित्व की है। इस बार मराठी माणुस किसी भी परिस्थिति में महाराष्ट्र के बेईमान लोगों का साथ नहीं देगा। हरामखोरों का पैसा लेकर उन्हें हरिश्चंद्र नहीं कहेगा।
महाराष्ट्र का स्वाभिमान
एक मशाल की तरह जल रहा है, इंजन की गति से आगे बढ़ रहा है। शिवाजी पार्क की सभा में मुख्यमंत्री फडणवीस तालतंत्र छोड़कर बोले। वे कहते हैं, ‘‘शिवसेना ने मराठी बच्चों को सिर्फ वड़ा-पाव के ठेले दिए। हम उन्हें उद्योग और रोजगार देंगे।’’ फडणवीस का यह बयान साठ साल पहले वड़ा-पाव खाकर ‘मराठी’ न्याय अधिकार के लिए ल़ड़नेवालों का अपमान करनेवाला है। साठ साल पहले शिवसेना की स्थापना के समय मुंबई में मराठी युवाओं को नौकरियों, रोजगार से बाहर रखा जाता था। शिवसेना के भगवा ध्वज के नीचे मराठी माणुस एकजुट हुआ। उस समय शिवसेनाप्रमुख ने कहा था, ‘‘अगर आज नौकरी नहीं मिल रही है तो खाली मत बैठो। वड़ा-पाव के ठेले लगाओ।’’ उसके बाद मुंबई का ‘वड़ा-पाव’ मशहूर हो गया। यह एक रोजगार और आर्थिक कारोबार का जरिया बन गया। ‘वड़ा-पाव’ के ठेलों ने मुंबई-महाराष्ट्र में बहुत रोजगार दिया है। आज ‘वड़ा-पाव’ न्यूयॉर्क, इंग्लैंड और यूरोपीय देशों तक पहुंच गया है। भले ही फाइव-स्टार होटलों में ‘वड़ा-पाव’ मिलता है, लेकिन लोग ‘वड़ा-पाव’ शिवसेना के ठेलों पर ही चाव से खाते हैं। फडणवीस जैसे लोग वड़ा-पाव की महानता और अहमियत को नहीं समझेंगे। क्योंकि उन्हें कष्ट कर मेहनत की कमाई करनेवाले सैकड़ों मेहनतकश लोगों से घृणा होती है। फडणवीस इडली-सांभर, ढोकला-फाफड़ा की प्रशंसा करेंगे, लेकिन मराठी वड़ा-पाव दिखाई दिया तो उन्हें पेटदर्द होने लगता है। फडणवीस को पता होना चाहिए कि गरीब से लेकर अमीर तक सभी ‘वड़ा-पाव’ बड़े ही चाव से खाते हैं। बड़े वर्ग का यह आहार है। फडणवीस के चहेते अमित शाह मुंबई आकर ‘वड़ा-पाव’ पर ही ताव मारते हैं और यह ‘वड़ा-पाव’
शिवसैनिकों की गाड़ी पर का ही
होता है। महाराष्ट्र के राजनीतिक कार्यकर्ताओं की चार-पांच पीढ़ियां मराठी वड़ा-पाव पर ही निर्भर रहीं, इसका अभिमान राज्य के मुख्यमंत्री को होना चाहिए। सबकी किस्मत राजपुत्र जय शाह जैसी नहीं होती। जय शाह को किस गुणवत्ता पर क्रिकेट उद्योग में रोजगार मिला? फडणवीस कहते हैं, ‘‘हम वड़ा-पाव नहीं, रोजगार देंगे।’’ हम पूछते हैं, मुख्यमंत्री महोदय, मुंबई-महाराष्ट्र के उद्योग और निवेश गुजरात ले जाए जा रहे हैं। इससे मराठी लोगों का रोजगार खत्म हो गया है। रोजगार देंगे कहां से? मुंबई-महाराष्ट्र के उद्योगों में ८० फीसदी भूमिपुत्रों को प्राथमिकता मिले, इसके लिए शिवसेना ने लड़ाई लड़ी थी। आज आपने इसी लड़ाई पर संकट ला दिया है। मुंबई के उद्योग गुजरात उठा ले जाने के बीच मुंह में ‘वड़ा-पाव’ दबाए बैठे फडणवीस नौकरी देने के झूठे वादे कर रहे हैं और हजारों युवाओं का ‘चूल्हा’ जलानेवाले वड़ा-पाव उद्योग को कम आंक रहे हैं। मराठी माणुस का वड़ा-पाव ‘इंटरनेशनल’ हो गया है, इस पर गर्व करने के बजाय, वह वड़े में जहर मिला रहे हैं। दक्षिण के शासक ‘इडली’ बिक्री की बुराई नहीं करते। बिहार के मुख्यमंत्री लिट्टी-चोखा पर गर्व करते हैं। दिल्ली में ‘कचौरी समोसा’ का उद्योग है। पंजाब में ‘मिस्सी रोटी और लस्सी’ का बोलबाला है। कर्नाटक में ‘बेन्ने डोसा’ जोरों पर है, लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री झुणका-भाकर और वड़ा-पाव से नफरत करते हैं। महाराष्ट्र को ऐसे शासक मिले, इसे दुर्भाग्य ही कहना पड़ेगा। वड़े के उबलते तेल में इस बार मराठी से नफरत करने वालों को तलकर, भूनकर निकालना चाहिए। वड़ा-पाव जिंदाबाद!
