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पड़ताल : मुंबई-पुणे ‘मिसिंग लिंक’ अब भी मिसिंग …७ साल, ७,५०० करोड़ रुपए फिर भी अधूरा भरोसा!

-मार्च-मई २०२६ की डेडलाइन पर बड़ा सवाल
-मानसून बहाना या सिस्टम की नाकामी?

जेदवी
पुणे, मुंबई एक्सप्रेसवे पर बहुप्रचारित ‘मिसिंग लिंक’ परियोजना एक बार फिर संदेह और सवालों के घेरे में है। सरकार और निर्माण एजेंसियां बड़े भरोसे के साथ दावा कर रही हैं कि मार्च २०२६ तक काम पूरा कर लिया जाएगा और मई २०२६ से यातायात शुरू हो जाएगा। लेकिन सात साल का लंबा इतिहास, लगातार बढ़ती लागत और अब भी अधूरे सुरक्षा इंतजाम इन दावों को खोखला साबित करते नजर आ रहे हैं।

२०१९ में जिस परियोजना को ‘गेम चेंजर’ बताकर शुरू किया गया था, वह अब तक अधूरी उम्मीदों का बोझ बन चुकी है। करीब ७,५०० करोड़ रुपए खर्च होने के बावजूद पुणे–मुंबई यात्रियों को राहत की जगह केवल नई तारीखें और नए वादे ही मिले हैं। शुरुआती अनुमान ३,६०० से ४,८०० करोड़ रुपए का था, लेकिन लागत दोगुने के करीब वैâसे पहुंच गई। इसका जवाब आज तक साफ तौर पर सामने नहीं आया। सवाल यह भी है कि इस अतिरिक्त खर्च की जिम्मेदारी किसकी है?
परियोजना का उद्देश्य था खोपोली एग्जिट से कुसगांव तक के खतरनाक १९ किमी घाट मार्ग को छोटा करना, १३.३ किमी की दूरी घटाकर २५–३० मिनट का समय बचाना और हादसों पर लगाम लगाना। इसके लिए १.६८ किमी और ८.८७ किमी की दो विशाल सुरंगें तथा लगभग १८१ मीटर ऊंचा घाट पुल बनाया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि ९३ प्रतिशत काम पूरा हो चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग तस्वीर पेश करती है। कई अहम कनेक्टिविटी पॉइंट्स, रोड सर्फेसिंग और सुरक्षा प्रणालियां अब भी अधूरी हैं। इन हालात में यातायात शुरू करना यात्रियों की जान को खतरे में डालने जैसा होगा।
हर देरी का ठीकरा मानसून पर फोड़ा जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का सवाल बिल्कुल सीधा है कि पश्चिमी घाट में बारिश कोई नई या अप्रत्याशित बात नहीं। अगर मानसून तय है, तो योजना बनाते वक्त उसे गंभीरता से क्यों नहीं जोड़ा गया? क्या यह मौसम की मार है य्ाा फिर कमजोर योजना और सिस्टम की नाकामी?
लागत बढ़ोतरी के साथ-साथ जवाबदेही भी गायब है। क्या देरी के लिए ठेकेदारों पर कोई जुर्माना लगाया गया? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई? इन सवालों पर अब तक कोई पारदर्शी सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। जनता का पैसा खर्च हो रहा है, लेकिन जनता को जवाब देने से बचा जा रहा है।
सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता बनकर उभरी है। सुरंगों में अलार्म सिस्टम की बातें जरूर हो रही हैं, लेकिन फायर सेफ्टी, इमरजेंसी एग्जिट, रेस्क्यू टाइम और मॉक ड्रिल्स को लेकर कोई सार्वजनिक ऑडिट या विस्तृत रिपोर्ट क्यों नहीं? क्या यात्रियों की जान के साथ प्रयोग किया जा रहा है?
ताजा स्थिति सुरंगों का काम लगभग पूरा बताया जा रहा है। टाइगर वैली पर ६५० मीटर लंबे केबल-स्टेड ब्रिज के अंतिम हिस्से, सड़क की सतह, लाइटिंग और सुरक्षा प्रणालियों पर काम जारी है। लक्ष्य: मार्च २०२६ तक पूर्णता, १ मई २०२६ (महाराष्ट्र दिवस) उद्घाटन, निर्माण: एमएसआरडीसी की देखरेख में, पैकेज-१ (सुरंग): नवयुग इंजीनियरिंग, पैकेज-२ (ब्रिज/वायडक्ट): एफकॉन्स इंप्रâास्ट्रक्चर।
अब सवाल साफ है कि क्या मई २०२६ सच में पुणे–मुंबई यात्रियों को राहत देगा? या फिर यह तारीख भी उन खोखले वादों की फेहरिस्त में जुड़ जाएगी, जिनके सहारे ७,५०० करोड़ रुपए की यह परियोजना सात साल से खिंचती चली आ रही है?

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