संजय श्रीवास्तव
ईरान का यह दावा कि वह अमेरिकी हमले के बाद नहीं बल्कि ऐसे किसी खतरे का ठोस संकेत मिलते ही इजराइल तथा आस-पास के अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाना शुरू कर देगा और ट्रंप के इस उद्गार के बाद कि वे हम बहुत गंभीरता से कुछ असरदार विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, ईरानी जनता का लंबा दु:स्वप्न अब खत्म होने वाला है। जल्द कोई फैसला लेंगे, के बाद लगता है कि ईरान का मसला उस मुकाम तक पहुंच गया है, जहां स्थिति सामान्य होना मुमकिन नहीं और युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी। ट्रंप की सनक का कोई तार्किक आकलन संभव नहीं। फिलहाल सीधे और वास्तविक युद्ध की आशंका कम हैं, लेकिन आशंका से इनकार भी नहीं किया जा सकता। युद्ध संभव है, पर अनिवार्य नहीं लेकिन भारी तनाव के बीच अमेरिका से परोक्ष टकराव की आशंका साफ दिखने लगी है। जिस तरह के हालात हैं उसे देखते हुए सीधे युद्ध न भी हो तो भी ईरान में अमेरिकी हवाई हमले, ईरान-इजराइल टकराव, प्रॉक्सी युद्ध का विस्तार तथा भीषण दमन के जरिये नियंत्रण जैसे परिदृश्य सामने आ सकते हैं। तात्कालिक तौर पर तख्तापलट, गृहयुद्ध, खामेनेई का पलायन या पहलवी की वापसी जैसे परिदृश्य की गुंजाइश कुछ कम है।
ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है लेबनान में हिज्बुल्लाह, यमन में हूती, इराक-सीरिया में शिया मिलिशिया, इस प्रॉक्सी नेटवर्क के इस्तेमाल से वह बिना सीधे युद्ध के अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बना सकता है। शैडो वार में ईरान की यही मजबूती उसे पूर्ण युद्ध से अब तक बचाए रखी है और आगे भी काफी हद तक बचाएगी। अमेरिका शायद यह जानता है कि वेनेजुएला, ईरान, ग्रीनलैंड, क्यूबा, मैक्सिको जैसे कई मोर्चों पर एक साथ दबाव बनाने की उसकी चाहत रणनीतिक थकान बढ़ा सकती है। ईरान जितना समझा जा रहा है उतना भी कमजोर नहीं है इसलिए वह अमेरिका के ‘गले की ऐसी फांस बन सकता है जिसे न पूरी तरह निगला जा सके, न छोड़ा जा सके। इसलिए सीधे युद्ध में उतरने के बजाय वह प्रतिबंध, साइबर-आक्रमण, सीमित हवाई हमला, आक्रामक बयानबाजी और ईरान अपने प्रॉक्सी टकराव पर टिका रह सकता है।
विरोध प्रदर्शन महंगाई से शुरू होकर कुशासन और सत्ता की वैधता के प्रश्नों तक पसर गए हैं। यह स्थिति २०२२ के प्रदर्शनों से अधिक जटिल है; क्योंकि तब मुद्दे सामाजिक-सांस्कृतिक थे, आज आर्थिक-राजनीतिक हैं। तब आंतरिक शक्तियां भर थीं, अब इसमें बाहरी तत्वों के दखल से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि उम्मीद रखने में कोई बुराई नहीं, कई आंतरिक उथल-पुथल वाले में संकटों में ईरानी राज्य सुरक्षा-संरचना और अपने धार्मिक वैचारिक अनुशासन के सहारे टिकता रहा है, लेकिन इस बार सामान्यीकरण बहुत कठिन है। अयातुल्ला अली खामेनेई ने अपने वहां के हालात के लिए अमेरिका-इजराइल को दोषी ठहराना गलत नहीं, बाहरी हस्तक्षेप वास्तविक हैं, सत्ता-परिवर्तन के लिए अस्थिरता पैदा करने का पश्चिम का इतिहास रहा है। इसलिए ईरान में यह आरोप पूरी तरह निराधार नहीं पर आंतरिक कारणों को इससे ढका नहीं जा सकता। असल में संकट के मुख्य खलनायक खामेनेई हैं, जिनकी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन, राजनीतिक दबंगई, सामाजिक स्तर पर सुधार की विफलताएं इसके लिए दोषी हैं। ईरान आज उन्हीं के चलते आर्थिक संकट, प्रतिबंधों, ऊर्जा-जल किल्लत, मुद्रा अवमूल्यन और सामाजिक असंतोष के बहुस्तरीय दबाव में है। उनके इशारे पर ईरानी अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को आर्थिक विरोध और सत्ता परिवर्तन की मांग करने वालों को बांटने की कोशिश की, सत्ता परिवर्तन की मांग वालों को दंगाई और विदेशी समर्थित किराए के सैनिक बताकर एलान किया कि ‘दंगों’ में शामिल सभी लोग खुदा के खिलाफ युद्ध छेड़ने के दोषी हैं, जिसकी सजा मौत है।
इससे मामला और भड़का, देशभर में जेन-जी आक्रोश में आ गया और हर महीने लगभग ७ डॉलर वैâश की मदद का एलान भी नाकाम साबित हुआ। हालांकि, हजारों के घायल होने सैकडों के मारे जाने के पश्चिमी मीडिया के चित्रण और विदेशी मानवाधिकार समूहों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि कठिन है, ‘पूर्ण अराजकता’ का चित्रण अतिरंजित भी हो सकता है, पर दमन हुआ है यह कतई नकारा नहीं जा सकता। आज ईरान उबाल के उस बिंदु पर है जिसमें अस्थिरता बरकरार रहेगी और गृहयुद्ध या तख्तापलट होने से पहले दमन और तेज होगा। अमेरिका में रह रहे निर्वासित रजा पहलवी ने आंदोलनकारियों को समर्थन देते और उकसाते हुए खुद को सत्ताशीर्ष का विकल्प बताया तो है पर फिलहाल उनके ईरान लौटने की संभावना क्षीण है; क्योंकि उनकी संगठित स्वीकार्यता सीमित है, वे प्रतीकात्मक धुरी बन सकते हैं पर निर्णायक शक्ति नहीं, सो सत्ता के राजनीतिक चरित्र में बदलाव अभी दूर की कौड़ी है।
उम्मीद यही है कि ट्रंप परोक्ष हवाई हमले, सैन्य ठिकानों को निशाना भले बनाएं पर सीधा हस्तक्षेप टालेंगे। तमाम सैन्य बढ़त के बावजूद सीधा युद्ध अमेरिका के लिए भी महंगा और अनिश्चित होगा। पर ट्रंप युद्ध पर उतारू हो गए तो क्या होगा? ईरान का रक्षा बजट ४० अरब डॉलर है, जो अमेरिकी रक्षा बजट ८०० अरब डॉलर के मुकाबले कुछ भी नहीं। अमेरिका के पास ईरान के नजदीक कई सैन्य अड्डे हैं, सैटेलाइट-आधारित इंटेलिजेंस, स्टील्थ विमान हैं। हवाई ताकत के मामले में अमेरिकी एफ ३५, एफ २२, अवाक्स जैसे लड़ाकू विमानों, बी-२ बॉम्बरों के सामने कमजोर वायुसेना वाला ईरान कब तक टिकेगा? हालांकि पूर्ण वायु वर्चस्व के बाद भी युद्ध का अंत किसी के पक्ष में तय नहीं होता पर अमेरिका द्वारा बड़े पैमाने पर ऐसे हवाई हमले संभव हैं, जो ईरान की वायु रक्षा और एयरबेस को शुरुआती चरण में ही भारी नुकसान पहुंचा देगा। ईरान के पास सैनिक अधिक होने के बावजूद टैंक-बख्तरबंद प्लेटफॉर्म पुराने हैं, निगरानी, तकनीक और बाकी हथियारों के मामले में वे अमेरिका से बहुत पीछे हैं जिससे खुले मैदान की सीधी लड़ाई में वह पिछड़ सकता है। पर मिसाइलें ईरान की ताकत हैं। उसकी बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें अमेरिकी ठिकानों, इजराइल और खाड़ी देशों के लिए वास्तविक खतरा बन सकती हैं। नौसेना छोटी तो है पर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संकरे समुद्री मार्गों में स्वार्म बोट्स, माइनिंग जैसी गुरिल्ला रणनीति अपनाकर वह वैश्विक तेल के तकरीबन तिहाई की आपूर्ति का रास्ता रोक सकता है, जिसका आर्थिक असर युद्ध से भी बड़ा होगा।
ईरान के पास भले घोषित तौर पर परमाणु हथियार न हों पर ६० फीसद से अधिक यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम चिंता का विषय तो है- यह निवारक दबाव बना रहेगा। संघर्ष इकतरफा लगता है पर लंबा खिंचा तो ईरान असंयमित युद्ध में भारी पड़ेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाएगी। तेल कीमतें, शिपिंग बीमा, वैश्विक महंगाई और उभरती अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होंगी। इस दौरान इजराइल की भूमिका देखनी होगी। यह तय है कि चीन बयानबीजी और कूटनीतिक वित्तीय समर्थन, खुफिया मदद तक सीमित रहेगा, सीधी सैन्य मदद की संभावना कम ही है। बहरीन, मिस्र निंदा से अधिक कुछ नहीं करेंगे। भारत के लिए ईरान ऊर्जा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय संतुलन का अहम स्तंभ है। हमें रणनीतिक स्वायत्तता के साथ तटस्थ रुख रखते हुए अमेरिका ईरान संवाद को बढावा देने की बात करनी होगी। हमें कूटनीति संयम, संवाद और नागरिक सुरक्षा तीनों पहलू पर समान बल देना होगा। ईरान के इस बहुआयामी संकट के बीच बिना किसी ध्रुवीकरण में फंसे संतुलन बनाते हुए चाबहार बंदरगाह, ऊर्जा सुरक्षा तथा ईरान में रह रहे अपने दस हजार से अधिक नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार हैं)
