के.पी. मलिक
ऑपरेशन सिंदूर के घाव अभी ताजा हैं। दिसंबर २०२५ में भारत ने पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर कड़ा सैन्य जवाब दिया, जिसमें पीओके में सटीक हमले शामिल थे। लेकिन इस दौरान चीन ने पाकिस्तान का न सिर्फ खुला समर्थन किया, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव लाकर बल्कि हथियारों की आपूर्ति भी जारी रखी। फिर भी नई दिल्ली में भाजपा ने चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का पारंपरिक स्वागत किया।
नजदीकियां
१० जनवरी को भाजपा मुख्यालय में आयोजित बैठक में दोनों पार्टियों ने ‘आपसी समझ और वैश्विक शांति’ पर चर्चा की। क्या मोदी सरकार की विदेश नीति ‘थाली का बैंगन’ बन गई है, जो चारों तरफ घूमती हुई दिशाहीन होती दिख रही है? क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर का बैकग्राउंड और चीन की भूमिका
ऑपरेशन सिंदूर भारत की ‘सर्जिकल स्ट्राइक २.०’ था, जिसका उद्देश्य पाकिस्तान से आतंकी लॉन्च पैड्स को नेस्तनाबूद करना था। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इसमें १२ आतंकी ठिकाने ध्वस्त हुए। लेकिन चीन ने इसे ‘भारतीय आक्रमण’ करार दिया और पाक को एस-४०० जैसी मिसाइल सिस्टम की डिलिवरी तेज की। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों से साफ है कि २०२५ में चीन-पाक व्यापार १५ फीसदी बढ़ा, जबकि भारत-चीन एलओसी पर पेट्रोलिंग विवाद बरकरार है। ऐसे में भाजपा-सीसीपी की नजदीकी कई सवाल खड़े करती है।
विपक्ष ने आरोप लगाते हुए कहा कि यह भाजपा का ऐतिहासिक दोहरा मापदंड है अगर विपक्ष इस प्रकार की बैठक करता तो भाजपा की प्रतिक्रिया क्या होती?
फर्ज कीजिए अगर यही सीसीपी मीटिंग कांग्रेस या आम आदमी पार्टी ने की होती। भाजपा का रिएक्शन क्या होता? २०२३ में टीएमसी के चीन दौरे पर अमित शाह ने उसे ‘राष्ट्रद्रोह’ कहा था। २०१९ में सीपीआई (एम) की चीनी पार्टी से बात पर बीजेपी -आईटी सेल ने ‘कम्युनिस्ट गठजोड़’ का हंगामा मचाया था आज खुद की कार्रवाई पर चुप्पी साधे बैठे हुए हैं तो क्या यह सत्ता का नशा है या मजबूरी? राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भाजपा की इस हरकत को कूटनीतिक विफलता बताते हुए कहा कि ‘मोदी जी ट्रंप के साथ फोटो खिंचवाते हैं, शी जिनपिंग के गुर्गों से चाय पीते हैं। यह संतुलन नहीं, बेचैनी बढ़ाने वाला है।’
डबल स्टैंडर्ड!
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ट्वीट किया है कि ‘चीन ने गलवान में २० जवान शहीद किए, उन्होंने लद्दाख को हड़प लिया। भाजपा अब उनकी आरती उतार रही? राष्ट्रीय हित बेचा जा रहा है!’ सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने जोड़ा, ‘भाजपा ने २०१४ से ‘चीन को सबक सिखाओ’ का नारा दिया। आज खुद सीसीपी से मेज पर हैं। अगर कांग्रेस ऐसी बैठक करती, तो ‘चीन एजेंट’ बोलते। दोहरा मापदंड बंद करो!’
सरकार का पक्ष है कि आर्थिक-रणनीतिक दबाव को कम करने की रणनीति है। मोदी सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के साथ क्वाड और आईसीईटी (क्रिटिकल टेक्नोलॉजी) पर आगे बढ़ रही है। लेकिन चीन से २०२५ में १२० बिलियन डॉलर का आयात जो कि कुल आयात का १४ फीसदी है उसकी निर्भरता बनी हुई है। जिसमें फोन, सोलर पैनल से लेकर एपीआई तक सब पर चीन का वर्चस्व कायम है। तो क्या भाजपा की यह नरमी आर्थिक दबाव में है? विशेषज्ञ प्रवीण स्वाभीमान्यन कहते हैं, ‘यह ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ नहीं, बल्कि ‘स्ट्रैटेजिक कन्फ्यूजन’ है वहीं भाजपा का बचाव करते हुए पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा कहते हैं कि ‘यह पार्टी-टू-पार्टी संवाद है, इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप या लेना-देना नहीं है। हमारी एलओसी पर बातचीत जारी है, व्यापार बढ़ाकर सीमा शांति सुनिश्चित करेंगे। विपक्ष हिंदू-मुस्लिम से आगे नहीं सोचता।’ विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संसद में स्पष्ट किया: ‘चीन से डीलिंग राष्ट्रीय हित पर आधारित। ऑपरेशन सिंदूर हमारी ताकत दिखाता है।’ बहरहाल, सवाल यह बाकी है, जिसका जवाब जनता ही दे सकती है कि क्या यह कोई कूटनीति की मास्टरी है या राष्ट्रीय सुरक्षा का समझौता? लेकिन बड़ा सवाल यही है कि भाजपा का कम्युनिस्ट विरोध कहां गया? विदेश नीति दबाव में है या ‘नीयत साफ’? २०२७ चुनावों तक ये सवाल गूंजेंगे। भारत को चाहिए एक मजबूत स्टैंड, न कि बैंगन जैसी घुमावदार नीति।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनैतिक विश्लेषक है)
