मुख्यपृष्ठस्तंभमैथिली व्यंग्य : चुनावी हलचल आ आम जनता!

मैथिली व्यंग्य : चुनावी हलचल आ आम जनता!

डॉ. ममता शशि झा मुंबई
मुरलीधर साँझमे घर एला त देखइत छथि जे भरि घरमे रंग-बिरंगक, अलग-अलग राजनैतिक दलक झंडा आ गलामे टांग बला छोटका दोपटा सनक कपड़ा जाहि पर चुनाव चिह्न आ नेता के फोटो प्रिंट रहइ छइ, आ जकर रंग दलक रंग के प्रस्तुत करइ छइ, छिड़ियाल अछि।
अपन पत्नी वृंदा के पूछलखिन, ‘ई सब कत सँ आयल, दलबला सब आब इहो बटई छइ की?’
वृंदा, ‘हम काल्ही स चुनाव प्रचारमे जाय बला छियई ताहि लेल हमरा देलक।’
मुरलीधर आश्चर्य सँ, ‘कोन दलबलाक संग आ कियेक? के इस अनेरो के काज कर लेल अहाँके कहलक?’
वृंदा, ‘बगल बला घरमे जे नीतू के माय रहई छथिन, हुनकर भाइ इलेक्शनक समयमे‌ यैह काज करइ छथिन, संजोग सँ अहि बेर ओ अपने वार्डक प्रचारक जिम्मेदारी सम्हारि रहल छथिन, हमरा नीतूके माय कहलथि जे घर बैसल की करब, चलु रजिस्टरमे अहुँके नाम लिखा दई छी। हम कहलियनि जे अनेरो के छिछिया लेल हम नहिं जायब, ताहि पर ओ कहलथि’ अनेरो के नहि ओ सब पाई दइ छइ, नाश्ता आ चाह सेहो, आ जीतलाक बाद तीर्थयात्रा पर सेहो!! एखन नेता सबहक खजाना खुजल छई, फेर स भर लेल!! हम सोचलहुँ ठीके छई पंद्रह दिन संगी-साथी संगे गप्पो करब, घुमियो लेब आ सबस बढ़िया जे अहि सब लेल‌ पाईयो भेटत!!
छोट-मोट अपन पसिन के चीजो खरीद लेब।
मुरलीधर, ‘मुदा ई एतेक अलग-अलग दलक चुनाव प्रचारक समान कियेक देलक? कोनो एक्कहि दलक प्रचार करबइ ने?’
वृंदा, ‘नहिं जाहि दिन जाहि दलमे जगह रहतइ ताहिमे जेबइ आ ओकर प्रचार करबइ। ओहूमे जे सबसँ बेसी पाई देतई ओहि रजिस्टरमे हमर सबहक नाम लिखल अछि, हर पार्टी के अहि तरहक काज करबला के आपसमे बड़ मेल रहइ छइ, सब अपन अपन लोकके बेसी स बेसी पाई कमाय के मौका दई छइ, कखनो काल क आपसमे लड़ियो लइ छथिन अपन नेताके प्रति वफादारी के प्रदर्शन करबाक लेल।’ मुरलीधर मुस्कियाइत, ‘बुझियउ नेते संगे राजनीति!!’ वृंदा, ‘हम रमण जी के कहलियनि इ त खराब बात अछि, आइ अहिमे काल्हि ओइमे। त नीतूके मामा रमण भैया कहला जे नेता सब त चुनाव जितलाक बादो दल बदलि लइ छइ त अहाँके किया समस्या अछि?’
वृंदा, ‘हमरा सब सनक सामान्य जनता त ई सब बुझितो नहिं अछि, हमर समस्या अछि जे रोज नब नाम, चुनाव चिह्न आ स्लोगन बदलि जायत त याद राखमे दिक्कत होयत।’
रमण, ‘ओहि लेल चिचिया के माईक पर बाज बला दस-बारह टा लोक फिक्स रहइ छइ, खाली भीड़मेका लोकसब बदली होइ छइ।’
मुरलीधरके चुनाव प्रचारक व्यवस्था पर छगुंता करइत सोच लगला चुनाव जितलाक बाद नेता सब कियेक अव्यवस्थित भ जाइ छथि!

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