मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : पहले मनुष्य प्रेम

तड़का : पहले मनुष्य प्रेम

कविता श्रीवास्तव

आवारा कुत्तों के हमलों और उनके काटने पर रेबीज से होने वाली मौतों के मामले में अंतत: देश के सुप्रीम कोर्ट को एक्शन लेना पड़ रहा है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने पशुप्रेमियों को लेकर एक कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी को आवारा कुत्ते के काटने से चोट लगती है या मौत होती है, तो राज्य सरकारें और कुत्तों को खाना खिलाने वाले लोग जिम्मेदार होंगे और उन्हें भारी मुआवजा देना पड़ सकता है। कोर्ट की चेतावनी है कि जो लोग आवारा कुत्तों को खाना खिलाते हैं, उन्हें उनकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए और उन्हें सार्वजनिक जगहों के बजाय अपने घर ले जाना चाहिए ताकि वे गंदगी न पैâलाएं और लोगों को काटें नहीं। कोर्ट ने सुझाव दिया है कि जो लोग कुत्तों की देखभाल करना चाहते हैं, उन्हें कानूनी नियमों के तहत निजी जगहों पर ऐसा करना चाहिए, न कि सार्वजनिक स्थानों पर। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कई बार पशुप्रेम के नाम पर कानून व्यवस्था, नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वच्छता की अनदेखी होती है। अदालत ने सख्त लहजे में कहा है कि इस संबंध में अब स्थानीय प्रशासन और डॉग फीडर्स की जिम्मेदारी तय की जाएगी। पीड़ित के लिए मुआवजा भी तय होगा। यह समझना होगा कि पशुओं के अधिकारों की रक्षा जरूरी है, लेकिन इसके साथ-साथ आम नागरिकों के अधिकार और सुरक्षा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई जगहों पर देखा गया है कि लोग आवारा कुत्तों या अन्य पशुओं को बिना किसी नियोजन के सार्वजनिक सड़कों, सोसायटी परिसरों और स्कूलों के आसपास चारा, खाना-पीना देने लगते हैं। इससे दुर्घटनाएं होती हैं। संक्रमण और बच्चों व बुजुर्गों की सुरक्षा का खतरा उत्पन्न होता है। पशुप्रेम का अर्थ यह नहीं है कि कानून और सामाजिक व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया जाए। पालतू और आवारा पशुओं को लेकर अक्सर झड़पें होती हैं। कई मामलों में पशुप्रेमियों और स्थानीय नागरिकों के बीच टकराव की स्थिति बनती है। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा है कि पशुओं की सुरक्षा के लिए बनी नीतियों का पालन करना हर पशुप्रेमी का दायित्व है। नगरपालिकाओं और स्थानीय प्रशासन को निर्देश दिया गया है कि वे पशुप्रेमियों के साथ समन्वय बनाकर कार्य करें। पशुओं को भोजन देने के लिए निर्धारित स्थान, टीकाकरण, नसबंदी कार्यक्रम और स्वास्थ्य जांच जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाए। पशुप्रेमियों से यह भी अपेक्षा है कि वे पशुओं की संख्या नियंत्रित करने, बीमार पशुओं का इलाज कराने और उन्हें सुरक्षित वातावरण देने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाएं। केवल भावुकता दिखाना वास्तविक सेवा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की यह फटकार वास्तव में एक नई पहल है। यह पशुप्रेमियों को याद दिलाता है कि सच्चा पशुप्रेम केवल करुणा नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है। पशुओं की रक्षा करते हुए समाज में शांति, सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखना भी आवश्यक है। पशुप्रेम से पहले मनुष्यप्रेम रखने का दायित्व भी है।

अन्य समाचार