-डाॅ. रवीन्द्र कुमार
आगे जाकर जनपथ रोड को राजपथ, पूर्व नाम, किंग्स वे काटती है अब इसका नाम कर्तव्य पथ रखा गया है। इसी रोड पर 26 जनवरी की परेड निकलती है। अब तो यह इलाका एक छावनी के माफिक हो गया है। कभी इसी के लॉन में बैठ हमने 26 जनवरी की परेड साल-दर-साल देखी है। इसके दोनों ओर जामुन के पेड़ हुआ करते थे। हम जैसे ही जामुन खाने लगते उनके ठेकेदार का आदमी न जाने कहाँ से प्रकट हो जाता और ताक़ीद करता कि पेड़ पर पत्थर से जामुन नहीं तोड़ना है केवल वे जामुन आप खा सकते हैं जो नीचे गिर गए हैं। इंडिया गेट के लॉन शादी के लिए लड़का-लड़की दिखाने के काम आता था। परिवार चादर/चटाई बिछा कर बैठ जाते थे। यह बहुत लोकप्रिय पिकनिक स्पॉट हुआ करता था। अब यह मुमकिन नहीं। पर्यटक की संख्या से अधिक पुलिस / सुरक्षाकर्मी सदैव घूमते रहते हैं। जगह जगह बैरिकेड खड़े कर दिये गए हैं। पहले चने वाला, आइसक्रीम वाले खड़े रहते थे अब ऐसा नहीं उसकी जगह ले ली है फूड प्लाज़ा ने। हम तो इंडिया गेट के अंदर जाकर भी बैठते थे। अब वहाँ अमर जवान ज्योति आ गयी है और किसी को नज़दीक भी नहीं फटकने देते। कभी 14 नवंबर के आसपास नज़दीक के चिलड्रन पार्क में हफ्ते-दो हफ्ते का बाल-मेला लगा करता था। स्टॉल/ खेल/ कल्चरल प्रोग्राम और फ़ैन्सी ड्रेस प्रोग्राम हुआ करते थे। कैनोपी जिस के नीचे अब सुभाषचंद बोस का स्चैचू सैल्यूट की मुद्रा में है वहां जॉर्ज पंचम का स्टेचू लगा हुआ था जिसमें रात को छतरी से एक मद्धम वाट का बल्ब भी जला करता था । पीछे नेशनल स्टेडियम था जिसमें पहले एशियाई खेलों 1951 का आयोजन हुआ था जिसका उद्घाटन पंडित नेहरू ने किया था। जब बना था तब अंग्रेजों ने इसका नाम इरविन स्टेडियम रखा था। इससे लगा हुआ था स्टेडियम सिनेमा। उसको ‘सर्विसेज सिनेमा’ कहा जाता था जो मूल रूप से सेना के लोगों के लिए होता था।, पर सिविलियन भी जा सकते थे। टिकट बहुत कम होती थी साठ पैसे फ्रंट स्टॉल के। बालकनी नहीं होती थी बस आगे और फिर पीछे वाली सीट को फर्स्ट क्लास कहा जाता था। स्टेडियम के अलावा दिल्ली में दो-तीन सर्विसेज सिनेमा थे, जैसे रेसकोर्स, पालम आदि। स्टेडियम का एक गेट वहाँ खुलता था जिसे आजकल प्रगति मैदान कहा जाता है॥ पहले उसका नाम एक्ज़िबिशन ग्राउंड था। रोड का नाम मथुरा रोड था। प्रसंगवश जॉर्ज पंचम का स्टेचू अब कोरोनेशन पार्क, बुराड़ी की शोभा बढ़ा रहा है। दरअसल अंग्रेजों के सभी स्टेचू पूरी दिल्ली से वहीं इकट्ठे कर दिये गए हैं।
आइये जनपथ रोड पर ही आगे बढ़ते हैं । बाएँ तरफ नेशनल आर्काइव का भवन हुआ करता था। यह आज भी है बल्कि उसका विस्तार हो गया है और एक एक्सटेंशन भवन और बन गया है। उसके ठीक सामने एक ट्यूब वैल भी हुआ कारता था। कालांतर में वह हटा दिया गया था। ट्यूब वैल को एक गोल घर से व्यवस्थित किया हुआ था। उसके साथ ही दाहिने हाथ पर एयर फोर्स की मैस थी। इसी का नाम सेंट्रल विस्टा मैस था। एनाउंस करता एक नीले रंग का बोर्ड भी लगा रहता। था। ‘एयर फोर्स ऑफिसर मैस’। दरअसल इसी एयर फोर्स मैस का (सेंट्रल विस्टा मैस) का एक प्रवेश द्वार विक्टोरिया रोड अब डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद रोड पर भी था। इसे काटती हुई जो रोड है उसका नाम विक्टोरिया रोड था। आज उसका नाम डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड है। डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर रहते थे, मोराजी देसाई साब, जगजीवन राम जी, एस के पाटिल और दीनदयाल उपाध्याय रहा करते थे। इसके साथ ही कभी चुनाव आयोग और केंद्रीय सतर्कता आयोग के दफ्तर भी इसी रोड स्थित कोठियों से चला करते थे। यही आगे चल कर हैदराबाद हाउस है वहाँ अंदर एक मस्जिद भी थी और एक मीट की दुकान भी हुआ करती थी जहां मटन के लिए हमारा साप्ताहिक चक्कर लगा करता था। उसके सामने ही नर्सिंग कॉलेज होता था। आगे चल कर यहीं बहाई हाउस है जो आज भी वहीं है। बहाई लोग का लोटस टेंपल एक देखने लायक कृति है। यही रोड है जहां लेडी इरविन स्कूल है और आगे पटौदी हाउस भी हुआ करता था।
डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर सेंट्रल विस्टा मैस की एंट्री होती थी। वहाँ कुछ दुकानें होती थीं किराने की दो दुकान थीं, एक हलवाई की दुकान थी और एक मीट की दुकान भी हुआ करती थी। साथ ही दो मंज़िल के एक कमरे के सरवेंट क्वाटर हुआ करते थे। जिनकी कॉमन लेवोटरी हुआ करती थी। एक साइकिल मिस्त्री की दुकान भी थी। यहीं से खरीदी मेरी एक एटलस साइकिल ओडियन सिनेमा से उठा ली गयी थी। मै साइकिल रोड पर खड़ा करके ‘हाथी मेरे साथी’ के पोस्टर देखने गया मिनटों मे नई साइकिल गायब। अभी तो उसका पेमेंट भी नही हुआ था। सोचो घरवालों को खासकर पिता को कितना दुख हुआ होगा, मेरी इस मूर्खता का। डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड के गोल चक्कर पर पान सिगरेट और दिन में एक मोची भी बैठा करता था जबकि दूसरी तरफ आधा दर्जन नाई बैठा करते थे। डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड पर स्थित थी विक्टोरिया मैस। फिर तोडफोड हुई और आज उसी सरजमीं पर शास्त्री भवन खड़ा है शास्त्री भवन के द्वार पर सतीश गुजराल जी का एक मुराल हुआ करता था। विक्टोरिया मैस के फर्स्ट फ्लोर पर मेरी पहली पाठशाला थी जिसे आजकल के.जी./ नर्सरी कहते हैं। एक अज़ब प्रथा थी। टीचर को आता देख उस दिन का नामित लड़का (बच्चा) ज़ोर से पुकारता “क्लास! स्टेंड अप !” पूरी क्लास खड़े होकर समवेत स्वर में कहती “जयहिंद!“ मेरी बारी शायद दाखिला लेने के एक दो दिन में ही आ गयी । टीचर ने मुझे गोद में उठा लिया। बाद में आनन -फानन मे सारी बस्ती उजाड़ दी गई और हमारा स्कूल भी मिट गया। इसके सामने वाले बंगले में तारकेश्वरी सिन्हा सांसद रहा करतीं थीं। इसी रोड पर आगे फिरोज़ गांधी रहा करते थे। यस दो मंजिला विशाल बंगलाआज प्रेस क्लब ऑफ इंडिया बना हुआ है। 15 जनपथ का नाम अंबेडकर फाउंडेशन है। यह वास्तव मे 13 जनपथ, 15 जनपथ, 17 जनपथ, 19 जनपथ और 21 जनपथ से मिल कर बना है। और तो और डॉ राजेन्द्र प्रसाद रोड की भी दो-चार कोठियाँ ले ली गईं। 15 जनपथ में हम रहा करते थे। पूरे 15 साल हम वहाँ रहे। 1972 में ही छोड़ी। 17 जनपथ इंटक का दफ्तर था, 19 जनपथ में कभी विद्याचरण शुक्ल और बाद में डॉ एल. एम. सिंघवी, राजा कुलकर्णी, एन. के. सोमानी रहा करते थे। 13 जनपथ में सांसद दामानी रहा करते थे। 21 जनपथ मे प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता ए के घोष रहा करते थे। बाद में यह नारायण दत्त तिवारी जी की काँग्रेस (टी) का कार्यालय बना। अपोजिट मे एक अंग्रेज़ डॉ रहा करते थे, सुनते थे वे कनॉट प्लेस मे अपना डेन्टिस्ट क्लीनिक चलाते थे । यह एक प्राइवेट बंगला था। बाद मे ये अंग्रेज़ डेन्टिस्ट शायद अपने देश लौट गए। 21 जनपथ के साथ ही कालटेक्स का पेट्रोल पंप हुआ करता था। जहां एक छोटी सी कार भी शीशे के शो केस मे रखी रहती थी हम स्कूल से आते जाते उसे बहुत देर तक निहारा करते और सोचते थे कभी शायद हम भी इस कार को खरीद पाएँ। आज इसी प्यारेलाल बिल्डिंग (कालटेक्स) पेट्रोल पंप के साथ ही मेरिडियन होटल खुल गया है। प्यारेलाल बिल्डिंग से पेट्रोल पंप तो बहुत पहले ही चला गया था। उसके साथ एक गली थी जिसके मुहाने पर चाय सिगरेट वाला बैठा करता था और एक साइकिल पंक्चर की दुकान थी जो यूं तो फ्री मे हवा भर लेने देता था पर यदि वह स्वंय भरता तो पाँच पैसे शुल्क था। आगे चल कर इसी गली मे एक कोयले वाले की दुकान थी। 15-17-19 जनपथ काॅम्पलैक्स के ठीक सामने 16-18-20 जनपथ का ग्रुप था। इसी में पं नेहरु की बहन कृष्णा हठीसिंह रहतीं थीं जब वे दिल्ली प्रवास पर होतीं। अन्यथा वे मुम्बई रहा करतीं थीं। कालांतर में भारतीय विदेश सेवा के रिटायर्ड शहाबुद्दीन बतौर सांसद वहां रहते थे। (क्रमश:)
