तौसीफ कुरैशी
यह सवाल सीधा नहीं है। यह किसी एक नाम पर उंगली टिकाने का खेल भी नहीं है। यह सवाल उस आईने का है, जिसमें हम सबको आपको, मुझे, सत्ता को, विपक्ष को और उस व्यवस्था को अपना चेहरा देखना चाहिए।
गद्दार कौन? राहुल गांधी? बीजेपी? संघ? या फिर आप और मैं? १९४७ का बंटवारा केवल जमीन का नहीं था, विवेक का भी था। जम्मू-कश्मीर के जिन दुर्गम, पिछड़े और दूर-दराज इलाकों पर न तब किसी ने ध्यान दिया, न बाद में, वे ऐसे ही ‘रणनीतिक रूप से महत्वहीन’ समझकर छोड़ दिए गए। वे इलाके अपनी स्वायत्तता में, अपनी बेखबरी में पड़े रहे।
अस्थायी के बहाने!
लेकिन इतिहास की यही विडंबना है जिसे आप महत्वहीन समझते हैं, वही कल आपके लिए निर्णायक बन जाता है। १९४८ आते-आते भारत ने उन क्षेत्रों पर दावा किया जो पाकिस्तान के कब्जे में चले गए थे। दावा नैतिक था, कानूनी था, ऐतिहासिक था। लेकिन दावा केवल कागज पर करने से नहीं टिकता, उसे जमीन पर संकल्प से भी बचाना पड़ता है। १९६३ में पाकिस्तान ने चीन से एक ऐसा समझौता किया, जो अपने आप में एक कबूलनामा था कि ये इलाके विवादित हैं और भारत-पाक विवाद सुलझने के बाद ही अंतिम स्वामित्व तय होगा। यानी पाकिस्तान ने भी चीन को स्थायी मालिक नहीं माना।
पर इतिहास में ‘अस्थायी’ शब्द अक्सर स्थायी धोखे में बदल जाते हैं। इन इलाकों में शहनवान घाटी जैसी जगहें सिर्फ नक्शे पर बनी रेखाएं नहीं हैं। वे रास्ते हैं सियाचिन तक पहुंचने के, भारत की धमनियों तक पहुंचने के। जो इस भूगोल को नहीं समझता, वह या तो मूर्ख है या फिर खतरनाक रूप से लापरवाह।
और अब अचानक चीन उसी घाटी पर अपनी दावेदारी पेश कर देता है।
अचानक! इतिहास में कुछ भी अचानक नहीं होता। अचानक तो केवल हमारी नींद खुलती है। इसी बीच तस्वीर का दूसरा प्रâेम देखिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का प्रतिनिधिमंडल, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर भव्य स्वागत, मुस्कुराहटें, प्रोटोकॉल और वैâमरों की चमक। यह दृश्य पूछता है क्या हमारी स्मृति इतनी छोटी है? क्या राष्ट्रवाद केवल भाषणों और नारों का नाम है? इस पर कांग्रेस भाजपा पर हमलावर हुई। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को बीजेपी मुख्यालय में कई नेताओं से मुलाकात की। चीन के साथ शक्सगाम घाटी पर गरमाए विवाद के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना और बीजेपी नेताओं की इस मुलाकात को लेकर अब कांग्रेस ने पीएम मोदी पर हमला बोला है। कांग्रेस ने सवाल पूछते हुए कहा कि बीजेपी-चीन में कौन सा गुप्त समझौता हुआ और पीएम मोदी चीन को लाल आंख कब दिखाएंगे? कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रेनेत ने सोशल मीडिया अकाउंट पर बीजेपी और सीपीसी नेताओं की मुलाकात की तस्वीर शेयर करते हुए कहा कि बीजेपी के नेता और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के बीच मीटिंग हो रही है। यह वही चीन है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का साथ दिया था, गलवान में हमारे जांबाजों की शहादत हुई। कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि चीन लद्दाख में अतिक्रमण किए बैठा है, अरुणाचल में गांव बसा रहा है और यहां बातचीत हो रही है। उन्होंने सवाल पूछते हुए कहा कि यह रिश्ता क्या कहलाता है? बीजेपी ने क्यों किया देशद्रोह? बीजेपी-चीन में कौन-सा गुप्त समझौता हुआ? चीन लद्दाख में अतिक्रमण किए बैठा है, अरुणाचल प्रदेश में गांव बसा रहा है और यहां गलबहियां हो रही हैं। वहीं कांग्रेस ने अपने आधिकारिक अकाउंट से एक वीडियो शेयर कर आरोप लगाया है कि मोदी सरकार में विदेश नीति वेंटिलेटर पर है। कांग्रेस ने शक्सगाम घाटी को लेकर कहा कि चीन वहां पर निर्माण कर रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी इस पर कोई एक्शन नहीं ले रहे हैं। कांग्रेस ने सवाल पूछते हुए कहा कि चीन को लाल आंख कब दिखाएंगे नरेंद्र मोदी।
क्या है मामला?
‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना’ (सीपीसी) के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को यहां बीजेपी मुख्यालय का दौरा किया। इस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व सीपीसी के अंतरराष्ट्रीय विभाग की उप मंत्री सन हयान ने किया। बीजेपी के विदेश मामलों के प्रभारी विजय चौथाईवाले ने ‘एक्स’ पर जानकारी देते हुए बताया कि बैठक के दौरान भाजपा महासचिव अरुण सिंह के नेतृत्व में एक दल ने ‘भाजपा और सीपीसी के बीच अंतर-दलीय संवाद को आगे बढ़ाने के तरीकों’ पर विस्तार से चर्चा की।
भारत में चीन के राजदूत शु फीहोंग भी सीपीसी प्रतिनिधिमंडल के साथ मौजूद रहे। चौथाईवाले के अनुसार, यह दौरा दोनों देशों के प्रमुख राजनीतिक दलों के बीच संचार और आपसी तालमेल बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है।
यही वह क्षण है, जहां ‘गद्दार’ का सवाल जटिल हो जाता है।
गद्दार वह नहीं होता जो सवाल पूछता है। गद्दार वह होता है, जो सवालों से भागता है।
गद्दार वह नहीं, जो सत्ता की आलोचना करता है। गद्दार वह होता है, जो सत्ता में रहकर भी सच्चाई से मुंह मोड़ लेता है।
अगर नेता प्रतिपक्ष जननायक राहुल गांधी सवाल पूछते हैं तो क्या वे गद्दार हैं? अगर सत्ता में बैठे लोग चीन की आक्रामकता पर अस्पष्ट बयान देते हैं तो क्या वे राष्ट्रवादी हैं? अगर संघ राष्ट्र को संस्कृति में खोजता है, लेकिन भूगोल पर चुप रहता है तो क्या यह पूर्ण राष्ट्रवाद है? और आप-मैं? जो हर शाम टीवी स्टूडियो में बैठकर राष्ट्रवाद की बीन बजाते हैं और नफरतियों को व नफरत का बहाना या अवसर देते हैं तो क्या यह राष्ट्रवाद है? या ये गद्दारी की श्रेणी में आता है, लेकिन नहीं, वहीं बैठकर तय किए गए राष्ट्रवाद को तालियां बजाकर स्वीकार कर लेते हैं।
जो यह नहीं पूछते कि हमारी सीमाओं पर क्या हो रहा है, बल्कि यह पूछते हैं कि किसने क्या कहा। जो राष्ट्र को सरकार में और सरकार को राष्ट्र में गड्ड-मड्ड कर देते हैं।
राष्ट्रवाद कोई डमरू नहीं जिसे बजाकर बताया जाए, वह एक ऐसी जिम्मेदारी है, जिसे मुनाफिक नहीं समझ सकते हैं उसको समझने और निभाने के लिए कुर्बानी देनी होती है।
राष्ट्रवाद मात्र झंडा लहराना नहीं, जमीन बचाना है।
राष्ट्रवाद विरोधी को चुप कराना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल करना है तो गद्दार कौन? वह जो चीन की दावेदारी को ‘डिप्लोमैटिक इश्यू’ कहकर टाल देता है? न कोई घुसा हुआ और न ही कोई घुसा है
वह जो रणनीतिक घाटियों को नजरअंदाज कर देता है?
या वह नागरिक जो जानना नहीं चाहता या समझना नहीं चाहता? गद्दारी कभी अकेले नहीं होती। वह सामूहिक चुप्पी से पैदा होती है। जब राष्ट्रवाद केवल चुनावी हथियार बन जाए, तब सीमाएं अपने आप असुरक्षित हो जाती हैं इसलिए पैâसला आप कीजिए।
गद्दार कोई एक पार्टी, एक नेता या एक संगठन नहीं है।
गद्दार वह सोच है जो राष्ट्र को सवालों से नहीं, नारों से बचाना चाहती है और अगर हम यह सोच बदलने को तैयार नहीं हैं तो इतिहास गवाह रहेगा कि इस बार भी दोष किसी और पर डाल दिया गया।
सत्यमेव जयते
(उपरोक्त आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं। अखबार इससे सहमत हो यह जरूरी नहीं है।)
