धीरेंद्र उपाध्याय / मुंबई
सत्ता की भूख में भाजपा ने महाराष्ट्र की मनपाओं के चुनाव को सियासी सर्जरी बना दिया है। सत्ता बचाने के लिए पहले सहयोगियों का इस्तेमाल किया और फिर शिंदे-दादा गुट का वजूद बेरहमी से खत्म कर दिया। टिकट और संगठन पर कब्जा कर इन्हें हाशिए पर धकेला गया। अंबरनाथ में तो अवसरवाद की हद पार करते हुए कांग्रेस को साथ लिया फिर उसके ११ नगरसेवकों को फोड़कर पार्टी की कमर ही तोड़ दी। ऐसे में शुक्रवार के नतीजों ने साफ कर दिया कि यह चुनाव विकास का नहीं, कुर्सी की जंग था और उसी जंग में भाजपा ने अपने ही साथियों की बलि चढ़ा दी।
इन चुनावों ने भाजपा की उस राजनीति को बेनकाब कर दिया है, जिसमें सहयोगी दल सिर्फ सीढ़ी बनकर रह गए। चुनाव से पहले ही संकेत मिलने लगे थे कि भाजपा अपने सहयोगियों को बराबरी का दर्जा देने के मूड में नहीं है। टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार रणनीति तक हर मोर्चे पर शिंदे और दादा गुट को हाशिए पर धकेला गया। कई जगहों पर उनके मजबूत दावेदारों के टिकट काटे गए तो कहीं संसाधनों की खुली कटौती की गई। सत्ता में साझेदारी का दावा करने वाले ये गुट चुनावी मैदान में असहाय नजर आए। इसी में महाराष्ट्र की २९ महानगरपालिकाओं की २,६६९ सीटों के नतीजों ने सत्ता की राजनीति को नंगा कर दिया है। मुंबई में भाजपा को ८९, शिंदे गुट को २९ और दादा गुट को ३ सीटें मिलीं।
यहां शिंदे गुट पिछलग्गू
भिवंडी में भाजपा २२ और शिंदे १२ पर रहे। पनवेल में भाजपा ने ५३ सीटें जीतकर शिंदे गुट को ४ पर सीमित कर दिया। मीरा-भायंदर में भाजपा ७८ और शिंदे सिर्फ ३ सीटों पर सिमटे। वसई-विरार में भाजपा को ४३ और शिंदे को मात्र १ सीट मिली। केडीएमसी में मुकाबला कांटे का रहा। भाजपा ५० और शिंदे गुट ५३ सीटों पर रहा। दादा के गढ़ पुणे में भाजपा ने १२३ सीटें जीतकर किला फतह कर लिया। दादा गुट २१ और शिंदे गुट सिर्फ १ सीट पर रह गया। पिंपरी-चिंचवड़ में भाजपा ५८, शिंदे १२ पर सिमटे और दादा गुट पूरी तरह साफ हो गया। छत्रपति संभाजीनगर में भाजपा ५८ और शिंदे १२ पर रहे।
बदलते समीकरण
मनपा चुनावों ने पहले ही राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी थी। अमरावती में गठबंधन टूटना, सोलापुर में ऐन मौके पर दलबदल, अकोला में वैचारिक और विरोधियों की नजदीकी घटनाओं ने बता दिया था कि महाराष्ट्र की मनपा चुनाव की राजनीति अब राज्य और भविष्य की सत्ता की दिशा तय करने का मंच बन चुकी है।
