सूरज सिंह
मुंबई के अपराध जगत में १९८० और ९० के दशक का दौर संगठित अपराध, गैंग युद्ध और पुलिस एनकाउंटर के लिए जाना जाता है। इसी दौर में उभरकर सामने आया नाम था दिलीप बुवा असली नाम दिलीप कहकों जिसे दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी के शार्पशूटर और गैंगस्टर माया डोलस के अत्यंत करीबी साथी के रूप में जाना जाता था। लेकिन दोनों एक दूसरे के विपरीत थे। जहां माया क्रोध वाला था, वही बुवा एकदम शांत था। लेकिन उसकी शांति के पीछे दहशत भरी पड़ी थी।
प्रारंभिक जीवन और अपराध की ओर रुझान
दिलीप बुवा का जन्म वर्ष १९६२ में बंबई (अब मुंबई) के एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों के साथ गलत संगत ने युवा दिलीप को अपराध की दुनिया की ओर मोड़ दिया। पहले छोटे अपराधों से शुरुआत हुई और फिर धीरे-धीरे वह हथियार, रंगदारी और फिरौती जैसे गंभीर अपराधों में शामिल हो गया।
डी-कंपनी से जुड़ाव
बुवा की तेजी, शौर्य और खतरनाक रवैये के कारण वह शीघ्र ही दाऊद इब्राहिम की डी-कंपनी से जुड़ गया। वहां उसे एक प्रशिक्षित शार्पशूटर के रूप में तैयार किया गया, जिसके बाद वह अंडरवर्ल्ड में अपनी पहचान बनाने लगा।
डी-कंपनी में रहते हुए उसका संपर्क माया डोलस से हुआ और दोनों मिलकर कई आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहे। यह जोड़ी रंगदारी, अपहरण, फिरौती और प्रतिद्वंदी गैंग के खिलाफ हमलों में सक्रिय मानी जाती थी।
मुंबई में अपराध का विस्तार
दिलीप बुवा के नाम पर कई वसूली, हत्या और हमले के मामले दर्ज हुए। वह आधुनिक हथियारों के प्रयोग में दक्ष था और एके-४७ जैसे हथियारों को चलाने में माहिर माना जाता था। मुंबई में उसके नाम का भय था और अपराध जगत में उसकी पहचान बेहद खतरनाक शूटर के रूप में थी।
लोखंडवाला एनकाउंटर
अंत की कहानी, दिलीप बुवा का खौफ १६ नवंबर १९९१ को समाप्त हुआ, जब मुंबई पुलिस और विशेष बलों ने मुंबई के लोखंडवाला कॉम्प्लेक्स में उसकी गैंग के खिलाफ बड़े पैमाने पर कार्रवाई की। इस एनकाउंटर में माया डोलस सहित उसके साथियों को चार घंटे चली गोलीबारी के बाद ढेर कर दिया गया। यह मुंबई के संगठित अपराध इतिहास का एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ था, क्योंकि यह पहला ऐसा दिन-दिहाड़े सार्वजनिक एनकाउंटर था जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा। इसी एनकाउंटर में दिलीप बुवा की मृत्यु हुई और उसके साथ ही उसके अपराधी जीवन का अंत हो गया।
दिलीप बुवा का जीवन मुंबई के उस दौर का प्रतीक है जिसमें युवा अपराध की दुनिया में प्रवेश कर ठेके पर हत्या और वसूली जैसे संगठित अपराधों का हिस्सा बनते चले गए। उसका अंत भले ही पुलिस कार्रवाई में हुआ, परंतु उसकी कहानी मुंबई के अंडरवर्ल्ड इतिहास में आज भी एक चर्चित अध्याय के रूप में दर्ज है।
