सुनील ओसवाल
– उत्पादन बढ़ा, कीमतों की गारंटी नहीं
– कागजों पर मजबूत, जमीन पर कमजोर किसान
सरकार इथेनॉल नीति को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की रीढ़ बता रही है। पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने के लक्ष्य तय हैं। तेल कंपनियों के साथ दीर्घकालीन समझौते हो चुके हैं। डिस्टिलरी उद्योग को विस्तार के रास्ते खुले हैं। कागज पर यह नीति भविष्य की तस्वीर बनाती है। लेकिन जब यही नीति खेतों में उतरती है, तो उसके नीचे किसान की जमीन दरकती दिखाई देती है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में मक्का आधारित इथेनॉल उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। बड़ी मात्रा में मक्का अब भोजन या पशुखाद्य नहीं, बल्कि र्इंधन बन रहा है। तेल कंपनियों के लिए सैकड़ों करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति तय की जा चुकी है। यानी मक्का अब फसल नहीं, राष्ट्रीय ऊर्जा ढांचे का कच्चा माल है। सवाल यह है क्या इस ढांचे में किसान की जगह तय है?
पड़ताल बताती है कि मक्का उत्पादन का बोझ उन्हीं राज्यों पर है, जहां खेती पहले से ही संकट में है कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश। इन इलाकों में किसान मौसम की अनिश्चितता, महंगी खेती और बाजार की अस्थिरता से जूझ रहा है। अब उससे अपेक्षा की जा रही है कि वह इथेनॉल मिशन की रीढ़ बने। लेकिन नीति की रीढ़ में किसान की सुरक्षा की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं दिखती।
सरकार बीज सुधार, प्रशिक्षण, यंत्रीकरण और उत्पादन वृद्धि पर जोर दे रही है। कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र, योजनाएं और अभियान सब सक्रिय हैं। लेकिन पड़ताल का सवाल उत्पादन नहीं, मूल्य है। क्योंकि जमीन पर तस्वीर यह है कि मक्का के दाम गिर रहे हैं। उत्पादन बढ़ाने का दबाव है, पर खरीद की गारंटी नहीं। उद्योग बढ़ रहा है, लेकिन किसान की आमदनी सिकुड़ रही है।
आंकड़े बताते हैं कि देश के कुल मक्का उत्पादन का बड़ा हिस्सा अब सीधे इथेनॉल उद्योग में खप रहा है। यानी उद्योग की निर्भरता मक्का पर बढ़ रही है। इसके बावजूद बाजार में कीमतों पर कोई स्थायी नियंत्रण तंत्र नहीं है। तेल कंपनियों को आपूर्ति अनुबंध हैं, डिस्टिलरी को संरक्षण है, लेकिन किसान खुले बाजार में छोड़ दिया गया है।
पड़ताल के दौरान विभिन्न राज्यों से सामने आती तस्वीर एक जैसी है फसल तैयार है, लेकिन दाम टूटे हुए हैं। सरकारी खरीद सीमित है। न्यूनतम समर्थन मूल्य कागज में है, खेत तक नहीं। नतीजा यह कि किसान उत्पादन बढ़ाने की सरकारी अपील और गिरती कीमतों के बीच पिस रहा है।
सबसे गंभीर सवाल यही है कि अगर मक्का राष्ट्रीय ऊर्जा नीति की बुनियाद है, तो मक्का उत्पादक किसान राष्ट्रीय सुरक्षा के दायरे में क्यों नहीं है? ऊर्जा सुरक्षा पर नीति है, लेकिन किसान सुरक्षा पर चुप्पी।
मक्का अब सिर्फ फसल नहीं, सरकारी ऊर्जा नीति का र्इंधन बन चुका है। लेकिन यदि इस र्इंधन की आग में किसान की जमीन ही जलती रही, तो यह मिशन ऊर्जा आत्मनिर्भरता नहीं, कृषि असंतोष की प्रयोगशाला बन जाएगा।
पड़ताल का निष्कर्ष साफ है-ऊर्जा नीति का भविष्य तभी टिकेगा, जब किसान उसके मूल में होगा, बोझ में नहीं।
